पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२०६

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१७० सिद्धान्त और अध्ययन ___ मवैवैते शन्नोरे येते तटस्थस्यैवैते न ममैवैते न शबोरेवैते न तटस्थस्यैवैते इतिसम्बन्धविशेषस्वीकारपरिहारनियमानध्यवसायात साधारण्येनं प्रतीतैर- भिव्यक्तः।' काव्यप्रकाश (२८ वीं कारिका की वृत्ति) संक्षेप में ममत्व-परत्व के सम्बन्ध से स्वतन्त्र होना ही साधारणीकरण है। ३. उनके द्वारा सामाजिकों के वासनागत स्थायीभाव जाग्रत हो उठते हैं। उस समय ये व्यक्ति के होते हुए भी व्यक्ति के नहीं रहते और अपने प्राकार से भिन्न भी नहीं होते अर्थात् अपना निजत्व नहीं खोते हैं । ४. सामाजिक का मन उस समय वेद्यान्तरसम्पर्कशून्य होता है और उसका सीमित या संकुचित प्रमाताभाव अर्थात् ज्ञाता होने का भाव जाता रहता है :- ... 'तत्काल विगलितपरिमितप्रमातृभाववशोन्मिषितवेद्यान्तरसम्पर्कशून्यापरि- मितभावेन ।'


काव्यप्रकाश (२८ वीं कारिका की वृत्ति)

५. वह भाव सकल सहृदयों के अनुभव का एक-सा विषय होता है ('सकल सहृदयसंवादभाजा )। ६. वह चळमाण होकर अर्थात् प्रास्वादित होकर रसरूप हो जाता है । रस का अनुभव अखण्ड : नौर प्रपानक रस (पन्ने) की भांति अपनी निर्माण- सामग्री (पन्ने के सम्बन्ध में खटाई, इलायची, मिश्री, काली मिर्च श्रादि और रस के सम्बन्ध में विभावानुभावादि ) से स्वतन्त्र होता है । .- नोट : इसमें आश्रय के साथ तादात्म्य की बात नहीं पाती वरन् पाठक का सब सहृदयों से समान भाव बतलाया है । इसमें सभी चीजों का साधारणीकरण माना गया है। साधारणीकरण का अर्थ है सम्बन्धों का साधारणीकरण । जिस प्रकार तर्कशास्त्र में धूम और अग्नि को साथ-साथ देखकर उसको देश-काल के बन्धनों से मुक्त करके, सार्वकालिक बना लेते हैं कि जहाँ-जहाँ धुआँ है वहाँ-वहाँ अग्नि है, वैसे ही साधारणीकरण में भयादि और कम्पादि के सम्बन्ध को व्यक्तियों के सम्बन्ध से मुक्त कर सार्वदेशिक और सार्वकालिक बना लेते हैं। अभिनवगुप्त कहते है.-'तत एव न परमितमेव साधारण्यमपितु वित्ततं व्या- प्तिग्रह इव धूमाग्न्योर्भयकम्पयोरेव वा'- इससे लेख के पहले पैरे में दिये हुए मेरे इस कथन की कि विज्ञान के नियम-निर्माण और साहित्य के साधारणीकरण में एक ही प्रवृत्ति है, पुष्टि हो जाती है । मम्मट' का मत अभिनवगुप्त के मत से भिन्न नहीं मालूम पड़ता है। . विश्वनाथ का मत :-साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने विभावों