पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२०७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


साधारणीकरण-डाक्टर श्यामसुन्दरदासजी का मत १७१ के साधारणीकरण के साथ उसके फलस्वरूप पाठक या दर्शक का प्राश्रय के साथ तादात्म्य माना है :-- 'व्यापारोऽस्ति विभावादेन म्ना साधारणीकृतिः॥ तत्प्रभावेण यस्यासन्पाथोधिप्लवनादयः । प्रमाता तदभेदेन स्वात्मानं प्रतिपद्यते ॥' -साहित्यदर्पण (३।६,१०) अर्थात् विभावादि का जो साधारणीकरण-व्यापार है उसके प्रभाव से प्रमाता समुद्रोलङ्घन आदि के उत्साह का अनुभव जो उसमें नहीं होता है, हनुमानादि के साथ अभेदरूप से अपने में कर लेता है। इसमें विभावों के साधारणीकरण के साथ प्राश्रय से पाठक के तादात्म्य की बात आ जाती है । साहित्यदर्पणकार ने आगे चलकर जो स्पष्टीकरण किया है वह अभिनवगुप्त के मत के अनुकूल है, देखिए :-- 'परस्य न परस्येति ममेति न ममेति च ॥ 'तदास्यादे विभावादेः परिच्छेदो न विद्यते ।' -साहित्यदर्पण (३।१२, १३) अर्थात् रसानुभूति में विभावादिकों के.सम्बन्ध में-ये मेरे है अथवा मेरे नहीं हैं, दूसरे के हैं अथवा दूसरे के नहीं हैं-इस प्रकार का विशेषीकरण नहीं होता है । इस व्याख्या में दर्शक या पाठक को ही मुख्यता मिल जाती है । इसमें तादात्म्य और अतादात्म्य का भी प्रश्न नहीं रहता। नोट : विश्वनाथ ने विभावन को तो जैसा भट्टनायक ने माना है वैसा ही माना है किन्तु उन्होंने इसके अतिरिक्त अनुभावन और संचारण नाम के दो और व्यापार माने हैं। रसादि को आस्वादयोग्य बनाना विभावन है, यही भट्टनायक का भावकत्व है । इस प्रकार विभावन किये हुए रत्यादि को रसरूप में लाना अनुभावन है, उनका सम्यक् रूप से चारण करना सञ्चारण कहलाता है। लेकिन इसमें यह समझना कि विभाव, अनुभाव और सञ्चारियों के नाम इसी आधार पर रखे गये हैं, ठीक न होगा । हाँ, इससे एक बात अवश्य प्रकट होती है कि विश्वनाथ ने स्थायी भावों को भी उतनी ही मुख्यता दी है। इस प्रकार साहित्यदर्पण में पालम्बन, आश्रय, स्थायी प्रादि और पाठक. सबका ही साधारणीकरण होता दिखाई पड़ता है। ___डाक्टर श्यामसुन्दरदासजी का मत :-बाबूजी ने प्राचार्य केशवप्रसाद मिश्र का अनुकरण करते हुए साधारणीकरण का सम्बन्ध योग की 'मधुमती.