पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२१२

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१७६ सिद्धान्त और अध्ययन - ऐसी भी अवस्थाएँ होती हैं जहाँ कोई आश्रय नहीं होता है, जैसे पाठकजी के 'काश्मीर-सुषमा'- वर्णन में, किन्तु इनमें कवि ही आश्रय होता है और इसमें कोई विशेष कठिनाई भी नहीं पड़ती है। रावण या परशुराम वाले उदाहरणों में भी अगर हम दूसरे पक्ष अर्थात् सीता या लक्ष्मण से तादात्म्य करें तो समस्या इतनी उग्र नहीं रहती--प्राश्रय और पालम्बन तो सापेक्ष शब्द है-- यह दूसरी बात है कि हमारा पुरुष-गौरव स्त्री के साथ तादात्म्य करना न स्वीकार करे । स्त्रियाँ तो उस दशा में सीता के साथ भाव-तादात्म्य करती ही होंगी । अभिनवगुप्त के मत में इस कठिनाई की कम गुञ्जाइश रह जाती है क्योंकि उसमें कवि के आश्रय के साथ पाठक को नहीं बाँधा जाता । स्वयं शुक्लजी का निजी मत भी इसके अनुकूल है । वे भी सम्बन्धों का ही साधारणी- करण मानते हैं - 'रसमग्न पाठक के हृदय में यह भेद-भाव नहीं रहता है कि यह पालम्बन मेरा है या दूसरे का है'-किन्तु वे आलम्बन में ऐसे गुणों की विषयगत सत्ता (Objective Existence)चाहते मालूम पड़ते हैं जिनके कारण वह सबका पालम्बन बन सके । डाक्टर नगेन्द्र का मत :-जहाँ आचार्य शुक्लजी पालम्बन में सामान्य गुणों की विषयगत सत्ता में विश्वास करते दिखाई देते है वहाँ डाक्टर नगेन्द्र काव्य के विषय को कवि की भावना ही मानते हैं। उनका अभिप्राय यह है कि विषय ( रामादि ) का वास्तविक रूप तो अज्ञात ही रहता है किन्तु कवि अपनी-अपनी भावना के अनुकूल उसका वर्णन करते हैं। उसी भावना का साधारणीकरण होता है और पाठक कवि की साधारणीकृत भावना का प्रास्वाद करता है, देखिए :- _ 'हम काव्य की सीता से प्रम करते हैं और काव्य की यह पालम्बनरूप सीता कोई व्यक्ति नहीं है, जिससे हमको किसी प्रकार का संकोच करने की श्रावश्यकता हो, वह कवि की मानसी सृष्टि है अर्थात् कवि की अपनी अनु- भूति का प्रतीक है । उसके द्वारा कवि ने अपनी अनुभूति को हमारे प्रति संवेद्य बनाया है। बस, इसलिए जिसे हम पालम्बन कहते हैं वह वास्तव में कवि की अपनी अनूभूति का संवेद्य रूप है । उसके साधारणीकरण का अर्थ है कवि की अनुभूति का साधारणीकरण गो. भट्टनायक और अभिनवगुप्त का प्रति- पाय है।' -रीतिकाव्य की भूमिका (पृष्ठ ५०) डाक्टर नगेन्द्र की प्रतिभा विषयीगत है। वे कवि को महत्त्व देते हैं और विषय के अस्तित्व को मिटा-से देते हैं । यद्यपि यह बात किसी अंश में ठीक है