पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२१६

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१८० सिद्धान्त और अध्ययन लेता है । साहित्यदर्पणकार ने पाठक या दर्शक के प्राश्रय के साथ तादात्म्य को विभावादि के साधारणीकरण का फल माना है। इस भावतादात्म्य से प्रसन्नता क्यों होती है, इस सम्बन्ध में उपयुक्त लेखक (A. E. Mander) का कथन है कि तादात्म्य के द्वारा दर्शक की कोई प्रार- म्भिक आवश्यकता जिसकी पूति उसके वास्तविक जीवन में नहीं होती (जैसे जङ्गल में शेर मारना, दुश्मन को घुटने टिका देना, चोरी का पता लगा लेना आदि) पूर्ण हो जाती है । क्रोध, शोक और भय का अनुभव भी (यदि उसके साथ वैयक्तिक क्षति न हो) हमारी आवश्यकताओं में से है। - मनोवैज्ञानिकों ने वास्तुकला (भवन-निर्माण-कला) में आनन्द लेने की बात की व्याख्या कुछ-कुछ इसी सिद्धान्त पर की है। अच्छे सुदृढ़ विशाल खम्भों में हम इसलिए आनन्द लेने लगते हैं कि हम उनमें अपना प्रक्षेपण (Projetion) कर उनके भार सम्हालने की शक्तिजन्य प्रसन्नता का अनुभव करने लग जाते हैं। कुछ समीक्षकों ने इस तदनुभूति को कल्पना का सर्वोत्तम रूप माना है- 'We have only one way of imuyining things from the inside and that is putting ourselves inside thoun' अर्थात् वस्तुओं की भीतरी कल्पना का एक ही मार्ग है और वह है अपने को उनमें रख देना। छायावाद का प्रकृति-वर्णन कुछ-कुछ इसी प्रकार का है ! आई० ए० रिचार्डस (I. A. Richards) अपनी पुस्तक 'Princi- ples of Literary Criticisin' (मालोचना के सिद्धान्त) के दो अध्यायों -'A Theory of Communication' अर्थात् भाव-प्रेषण की एक कल्पना और 'The Normality of the Artist' अर्थात् कलाकार की सर्व- साधारणानुकूलता-में साधारणीकरण की समस्या के बहुत निकट पहुँच गये हैं। ये इस बात को मानकर चलते हैं कि मनुष्य की (अर्थात् पाहने वाले और सुनने वाले दोनों की ही) प्रवृत्तियाँ प्रायः एक-सी होती हैं, इसी कारण कवि समान भावों की जाग्रति करने में समर्थ होता है । जहाँ पर कवि का अनुभव पाठक के अनुभव के साथ ऐक्य नहीं रखता ( शुक्लजी का दिया हुआ उदाहरण दुहराते हुए हम कहेंगे, जैसे कोई कवि किसी कुरूप और फूहड़ स्त्री को प्यार करे) वहाँ पर उसको सफलता न मिलेगी। इसमें अनुभवों के पूर्ण तादात्म्य की आवश्यकता नहीं । वे कहते हैं कि छोटी-मोटी विषमताएँ कल्पना के बल से दूर की जा सवाती हैं। कलाकार की यथासम्भव विलक्षण मनोवृत्ति को 'Eccentric'. न होना चाहिए । इसके साथ उन्होंने यह भी बतलाया है कि किस हद तक कवि