पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२१८

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१५२ सिद्धान्त और अध्ययन ईष्यादि भावों की गुञ्जाइश रहती है। कवि भी अपने निजी व्यक्तित्व से ऊँचा उठकर साधारणीकृत हो जाता है । वह लोक का प्रतिनिधि होकर (जब वह निजी भावों की अभिव्यक्ति करता है तब वह भी लोक में शामिल हो जाता है ) भावाभिव्यवित करता है । पाठक का साधारणीकरण इस अर्थ में होता है कि वह अपने व्यक्तित्व के क्षुद्र बन्धनों को तोड़कर लोकसामान्य की भाव-भूमि में आजाता है, उसका हृदय कवि और लोकहृदय ( जिसमें विशेष परिस्थितियों को छोड़ कर काव्य का प्राश्रय भी आजाता है ) के साथ प्रतिस्पन्दित होने लगता है । अपने व्यक्तित्व की अनुभूति रसास्वाद में बाधा मानी गई है। ... भावों का साधारणीकरण इस अर्थ में होता है कि उनसे भी 'अयं निजः परो वा' की भावना जाती रहती है और इस कारण उनमें लौकिक अनुभव की स्थूलता, कटुता, तीक्ष्णता और रुक्षता नहीं रहती है। एकात्मवाद के अधिक प्रचार के कारण भारतीय मनोवृत्ति सामान्य की ओर अधिक झुकी हुई है। एकात्मवाद के कारण अनुभवों और प्रवृत्तियों की एकता तथा भावों के तादात्म्य को दृढ़ भित्ति मिल जाती है किन्तु साधारणीकरण के प्रवाह में वैयक्तिक विशेताओं को न बहा देना चाहिए । कवि की विशेषताएँ ही जनता की मनोवृत्ति बदलती हैं । पाश्चात्य देशों में व्यक्ति का मान है। हमको भी उसे भूलना न चाहिए । - प्राचीन आदर्शों और वर्तमान प्रादर्शों में इस बात का अन्तर हो गया है कि पहले नायक प्रख्यात और उच्चकुलोद्भव होता था और अब 'होरी' किसान भी उपन्यास का नायक बन जाता है । पहले प्रख्यात नायक इसीलिए रहता था कि जिससे सहृदय पाठकों का सहज में तादात्म्य हो जाय, अब लोगों की मनो- वृत्तियाँ कुछ बदल गई हैं। प्राभिजात्य का अब उतना मान नहीं रहा है, इसीलिए होरी के सम्बन्ध में पाठकों का सहज में ही तादात्म्य हो जाता है। पात्र के कल्पित होने से भी उसके साधारणीकरण में बाधा नहीं पड़ती क्योंकि वह प्रायः अपनी जाति का प्रतिनिधि होता है । मनुष्य में साधारणीकरण की प्रवृत्ति स्वाभाविक है । इसके आधार में भारतीय एकात्मवाद है। सब मनुष्यों का अनुभव अपनी-अपनी विभिन्नता रखता हुआ भी एक होता है, इसीलिए हम शेक्स- साधारणीकरण क्या पीयर के काव्य में प्रानन्द ले सकते हैं और पाश्चात्य होता है । __ देशों वाले कालिदास में। मनुष्य अपने अनुभव को देश-काल में सीमित नहीं रखना चाहता है, वह उसे