पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२४०

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.. . सिद्धान्त और अध्ययन चेतसी वर्तयित्री स्यात् सा वृत्तिः सापि षड्विधा ।।' -सरस्वतीकराठाभरण (२१३४) भोज ने मध्यम प्रारभटी और मध्यम कैशिकी दो और वृत्तियाँ मानी हैं । हमको यह समझ लेना चाहिए कि बाहरी आकार भीतरी मनोवृत्ति के ही अनुकूल होता है। काव्यप्रकाशकार का भी यही मत है इसलिए उन्होंने रीति और वृत्ति में अन्तर नहीं किया है। एक बात अवश्य है कि दोनों रीतियाँ और वृत्तियां शैलियों के वर्ग से सम्बन्ध रखती हैं। अंग्रेजी शब्द 'Style' वर्ग और व्यक्ति दोनों की शैली के लिए पाता है । यह बात रीतियों और वृत्तियों में नहीं है । व्यक्ति की शैली के लिए शैली शब्द का ही व्यवहार होगा। रीतियों और वृत्ति यों के विभाजन को भामह ने कोई महत्त्व नहीं दिया। इस नाम-भेद करने को उसने बुद्धिहीनों का भेडियाधसान कहा है :-- 'गौडीय मिदमेतत्त वैदर्भमिति किं पृथक् । गतानुगतिकन्यायान्नानाख्येयममेधसाम् ॥' -काव्यालङ्कार (११३२) हमारे यहाँ के कुछ प्राचार्यों में भेदों के न मानने की आधुनिक प्रवृत्ति पाई जाती है। दश गुण :~-वामन आदि द्वारा स्वीकृत शब्द और अर्थ के दश-दश गुणों का वर्गीकरण यद्यपि बहुत वैज्ञानिक नहीं है तथापि उसके द्वारा शैली के गुणों और प्रकारों पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। इन गुणों का क्रम और उनकी व्याख्या भिन्न-भिन्न प्राचार्यों में भिन्न-भिन्न रूप से की है। यहाँ पर रस- गंगाधर के काम के अनुसार गुणों के नाम दिये जाते है :.-":.." 'श्लेषः प्रसादः समता माधुर्य' सुकुमारता। अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजःकान्तिसमाधयः ॥' -रसगंगाधर (पृष्ठ २५) श्लेष के सम्बन्ध में कहा है कि यह वह गुण है जिसमें एक जाति के वर्ण पास रखे जायें, प्रसाद वह गुण है जिसके द्वारा चुस्त और शिथिल रचनाएँ बारी-बारी से लाई जायँ, समता वह गुण है जिसके द्वारा एक ही प्रकार की रचना प्रारम्भ से अन्त तक रहे। माधुर्य और सुकुमारता करीब-करीब माधुर्य- गुण से मिलते हैं। अर्थव्यक्ति तीन गुण वाले प्रसाद का नामान्तर है । उदारता और प्रोज' प्रोज के अन्तर्गत है । कान्ति शोभा का विशेष नाम है । यह एक प्रकार से शैली की पौलिश-सी है। प्रसादगुण की भाँति समाधि में गाढ़ और