पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२४६

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- - - --- - - - - - - - - सिद्धान्त और अध्ययन पदोंवाली रचना को 'परुषा' कहते हैं । इन दोनों से भिन्न वर्णीवाली वृत्ति को 'कोमला' कहते हैं । वामन के मस से इनको वैदर्भी, गौडी और पाञ्चाली कहते हैं। इनके अतिरिक्त लाट देश ( गुजरात ) की लाटी, अवन्ति की आवन्ती और मगध की मागधी रीतियाँ भी मानी गई हैं । साहित्यदर्पणकार ने पदों के संगठन या संयोजन को रीति कहा है। उन्होंने इनको 'अङ्गसंस्था- विशेषवत्' अर्थान् मुखादि प्राकृति को विशेषता के समान बतलाकर रस की उपकार करनेवाली कहा है और इनके चार भेद माने हैं :- 'पदसंघटना रीतिरसंस्था व शेषवत् । उपकी रसादीनां सा पुन: स्थाच्चतुर्विधाः ॥' -साहित्यदर्पण ( ६१) साहित्यदर्पणकार कविराज विश्वनाथ की मानी हुई चार रीतियां इस प्रकार हैं :- १. वैदर्भी : माधुव्यजक वर्णों से युक्त तथा समासरहित वा छोटे समासवाली ललित रचना । .२, गौडी : प्रोज अर्थात् तेज को प्रकाश में लानेवाले वर्षों से युक्त, बहुत-से समास और पाडम्बरों से बोझिल उत्कट रचना । ३. पाचाली : दोनों से बचे हुए वर्णों से युक्त पाँच या छः पद के समासोंवाली रचना। ४. लाटी : वैदर्भी और पाञ्चाली के बीच की रचना। हम पहले ही कह चुके हैं कि सामञ्जस्य हो शैली का प्राण है । लक्षणा: और व्यञ्जना भाषा को ऐमी शक्तियाँ हैं जिनमें भाषां सप्राण हो जाती है। . इनका सम्बन्ध अर्थ से है और इनके द्वारा अर्थ में अभिधा, लक्षणा चित्रोपमता और सजीवता पाती है। भाषा की तीन और व्यञ्जना शक्तियाँ मानी गई है—अभिधा; लक्षणा, व्यञ्जना। अभिधा से साधारण अर्थ व्यक्त होता है। लक्षणा द्वारा अर्थ के विस्तार से भाषा में रबड़ की भाँति खिंचकर बढ़ जाने की शक्ति आती है । बँधे-बँधाये अर्थों को कुछ विस्तार और भिन्नता देने में जो बाधा ..... पड़ती है. उसका लागों द्वारा शमन हो जाता है और भाषा में एक विशेष प्रकार की गतिशीलता आजाती है। शब्दों के अल्प व्यय से अर्थ-बाहुल्य में . सुलभता होती है और वाग्वैदग्ध्य ग्राजाता है । कभी-कभी वाक्य में प्रस्तुत शब्दों के अभिधा से प्राप्त अर्यों में भी एक चमत्कार उत्पन्न हो जाता है। व्यञ्जना में शब्दों का आधार लक्षणा से भी कम हो जाता है और शब्द से संकेत पाकर