पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२४७

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काव्य का कलापक्ष-पाश्चात्य श्रावार्यों के मत अर्थ उमड़ पड़ता है । व्यञ्जना के सहारे निबन्ध में कन्कार पैदा हो जाती है और शैली में प्राणों की स्वयं प्रतीति होने लगती है । वह शक्ति वाक्यरचना में ऐसा प्रभाव पैदा कर देती है कि पाठक लेखक से. तादात्म्य अनुभव करने लगता है । व्यञ्जना में यह बात अत्यन्त वाञ्छनीय है कि अर्थ व्यङ्गय रहते हुए भी शब्द कहीं दुरूह न हो जायें । अपरिपक्व और अधूरे लेखक व्यञ्जना का यथार्थ प्रयोग नहीं कर सकते और जो इसका सहज प्रयोग कर सकते हैं वे अपने प्रत्येक वाक्य को सारगर्भित, प्राणवान् और सशक्त बना देते हैं। प्राचार्यों ने इन प्रधान शक्तियों के भी कई विभेद किये हैं । शैली में इस प्रकार भाषा और भाव का सामञ्जस्य इन तीनों शक्तियों के द्वारा होता है। इनके विशेष विवरण के लिए 'शब्द-शक्ति' वाला अध्याय पढ़िए । यद्यपि ऊपर बताया हुआ एकता में अनेकता और अनेकता में एकतावाला शैली का व्यापक आदर्श पूर्व और पश्चिम में एक-सा ही है तथापि उस आदर्श की पूत्ति के साधनों एवं रूपों का विवेचन भिन्न-भिन्न पाश्चात्य प्राचार्यों प्रकार से हुआ है । इसी कारण लोग पूर्वी और पाश्चात्य के मत . मतों का भेद कर देते हैं। शैली के सम्बन्ध में पाश्चात्य . प्राचार्यों ने काफी सोचा है किन्तु वहाँ के सम्बन्ध में भी: यही कहा जा सकता है कि 'नैकोमुनिर्यस्य वच: प्रमाणम' ! यहाँ पर हम अंग्रेजी: के उद्धरण न देकर श्रीकरुणापति त्रिपाठी लिखित 'शैली' नाम की पुस्तक से दो मत उद्धत करते हैं। एक मत के अनसार जो पाठक के मस्तिष्क पर पड़े हुए प्रभाव को मुख्यता देता है, शैली के गुण इस प्रकार दिये गये हैं :---.. . 'व्याकरण से सम्बद्ध शुद्धता के अतिरिक्त स्पष्टता (पारस्पिक्विटी) सजीवता (पिवेसिटी), लालित्य (ऐलिगन्स), उल्लास (ऐनीमेशन) और लय (म्यूजिक) इन पांचों गुणों का होना आवश्यक है।' .. -शैली (श्रीकरुणापति त्रिपाठी) दूसरा मत मिंटो का है । उस मत के अनुसार नीचे लिखे गुण अावश्यक _ 'सरलता (सिम्प्लिसिटी), स्वच्छता (क्लीयरनैस), प्रभावोत्पादकता (स्ट्रेग्थ), मर्मस्पर्शिता (पैथोस), प्रसङ्ग सम्बद्धता (हार्मनी) और स्वरलालित्य (मलौडी)।' -शैली (श्रीकरुणापति त्रिपाठी) इस सम्बन्ध में शैली के बौद्धिक और रागात्मक गुणों का भी उल्लेख हुना