पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२५२

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सिद्वान्त और अध्ययन अनुकूल व्यक्ति, जाति, प्राकृति, क्रिया आदि में मानना ठीक होगा। ___ अभिधा की मुख्यता :-देवजी ने इन तीनों वृत्तियों में अभिधा को मुख्यता मानी है, देखिए :-- 'अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य ल पछना लीन । अधम व्यंजना रस कुटिल, उलटी कहत नवीन ॥' ......शब्दरसायन (षष्ठम प्रकाश, पृष्ठ ७२) यह कथन केवल इसी अर्थ में सार्थक हो सकता है कि लक्षणा और व्यञ्जना, अभिधा पर ही प्राश्रित रहती है। लक्षणा में भी अभिधार्थ से योग रहता है और व्यञ्जना भी अभिधा के आधार पर ही चलती है, जो व्यञ्जना लक्षणामूला रहती है अथवा जो व्यञ्जना पर भी चलती है। यह भी अन्त में अमिधा के ही ग्राश्रय में कही जायगी किन्तु चमत्कार की दृष्टि से व्यञ्जना ही मुख्य है । उसमें कवित्व की मात्रा अधिक रहती है । रस में भी उसका ही काम पड़ता है। कभी-कभी अभिधा में भी चमत्कार रहता है किन्तु व्यजना का अधिक महत्त्व है । उसमें थोड़े में बहुत की बात, जो सौन्दर्य का गुण है, प्राजाती है । कविधर श्रीमैथिलीशरण गुप्त ने तो 'साकेत' में 'गङ्गा में गृह' को सहजवाचकता का ही चमत्कार दिखाया है :- 'बैठी नाव निहार . लक्षणा-व्यंजना, 'गङ्गा में गृह' वाक्य सहज वाचक बना।' साकेत पंचम सर्ग) कभी-कभी मुहावरे के लाक्षणिक प्रयोग के साथ अभिधार्थ मिल जाने से भी चमत्कार बढ़ जाता है, जैसे :--- 'आँख दिखावति मूढ़ चढ़ी मदकावति चन्द्रिका चाव से पागी । रोकति साँसुरी पाँसुरी में यह बाँसुरी मोहन के मुख लागी ॥' -स्फुट • 'आँख दिखावति मूड़ चढ़ी', 'मुख लागी-----ये प्रयोग अभिधार्थ श्रीर लक्ष्यार्थ दोनों में ही सार्थक हैं । यहाँ पर 'मुख लागी में अर्थ का बाध तो नहीं होता लेकिन रूढ़ि के आधार पर लाक्षणिक अर्थ भी लग जाता है। कविवर बिहारीलाल ने भी राधारानी की बन्दना में रङ्गों के मिश्रण के ज्ञान का परिचय देते हुए अभिधा पीर लक्षणा का बड़ा सुखद समिश्रण किया है :..--. 'मेरी भव-बाधा हरी राधा नागरि सोह। जा तन की झाँई परे स्यामु हरित दुति होइ ॥' ---बिहारी-रत्नाकर (दोहा १)