पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२६७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


ध्वनि और उसके मुख्य भेद-स्फोट से सादृश्य २३१ व्यजित होता है। ध्वनि का सिद्धान्त वैयाकरणों के स्फोट के सादृश्य में उपस्थित हुआ है। शब्द के अर्थ के सम्बन्ध में यह प्रश्न होता है कि शब्द के सुनने पर किस प्रकार से अर्थ की अभिव्यक्ति होती है ? इस अभिव्यक्ति स्फोट से सादृश्य के सम्बन्ध में यह कठिनाई उपस्थित की जाती है कि 'फ, म, ल' कहने में 'क' की ध्वनि नष्ट होने पर 'म' आता है और 'म' के नष्ट होने पर 'ल' अाता है तब 'कमल' से 'अमल' का ही अर्थ क्यों नहीं निकलता है क्योंकि दोनों के ही अन्त में 'म' और 'ल' है। 'क, म, ल' को एक साथ भी नहीं कहा जा सकता । एक क्षण में तीनों ध्वनि नहीं रह सकती हैं। इस आपत्ति के सम्बन्ध में नैयायिकों का कहना है कि 'क' नष्ट तो हो जाता है किन्तु मन पर अपना संस्कार छोड़ जाता है, इसी प्रकार 'म' भी अपना संस्कार छोड़ देता है । अन्त में 'ल' इन पूर्व के दोनों संस्कारों से मिलकर 'कमल' का अर्थ देता है । वैयाकरण इसमें यह आपत्ति. करते हैं कि स्मृति में उलटा क्रम चलता है पीछे की वस्तु का जल्दी स्मरण होता है, इसलिए 'पलक' का 'कलप' और 'फलक' का 'कलफ' हो जाना अधिक सम्भव है । इस आपत्ति के निराकरण के लिए वैयाकरणों का यह कथन है कि 'कमल' या 'पलक' ये शब्द वैखरी वाणी के हैं । वैखरी वाणी वह है जो हमको सुनाई पड़ती है किन्तु इसके पूर्व मध्यमा, पश्यन्ती और परा वाणी हैं । वे नित्य और अखण्ड हैं । 'क, म, ल' कहने पर 'क, म, ल' प्रत्येक वर्ण से 'कमल' के अखण्ड रूप की जाग्रति होती है किन्तु 'क' और 'म' से वह पूर्ण रूप से नहीं होती है वरन् 'ल' के उच्चा- रित होने पर वह जाग्रति पूर्ण और स्पष्ट हो जाती है और एक साथ वह अखण्ड शब्द 'कमल' प्रस्फुटित हो जाता है जिसका कि अर्थ से नित्य सम्बन्ध है। वैयाकरण व्यक्त शब्द, जो हमको सुनाई पड़ता है, और अर्थ के बीच में एक स्फोट की ओर कल्पना करते हैं जिसका अर्थ के साथै सम्बन्ध रहता है, यह एक साथ प्रस्फुटित होता है, इसीलिए स्फोट कहलाता है । वैयाकरणों के मत । से 'क, म' के संस्कार 'ल' के मिलने-मात्र से अर्थव्यक्ति नहीं होती वरन् वे संस्कार उत्तरोत्तर उस अखण्ड स्फोट को प्रकाशित करने में सहायक होते . हैं । अर्थ- व्यक्ति स्फोट से होती है-'पूर्व पूर्ववर्णानुभवाहित संस्कारसचिवेन अन्य वर्णानुभवेने अभिव्यज्यते स्फोटा' (शंकरन के 'Some Aspects of Sanskrit Criticism', पृष्ठ ६४ के उवरण से उद्ध त)--यह शब्द का