पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२७०

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२३४ सिद्धान्त और अध्ययन 'सुनि सनि प्रीतम श्रालसी, धूर्त सूम धनवंत । नवल बाल हिय में हरष, बादत जात अनंत ॥' -भिखारीदास कृत काव्यनिर्णय (ध्वनिभेदवर्णन ३३) नवबधू अपने पति की तारीफ में सुनती है कि वह पालसी है। 'आलसी' शब्द से यह व्यञ्जना होती है कि वह किसी के बहकाने में न पावेगा और न अन्यत्र जायगा । सूम और धनवन्त से यह व्यञ्जना होती है कि रुपया तो उसके खर्च को रहेगा किन्तु वह और किसी के कहने में न आवेगा, इसीलिए वह प्रसन्न होती है। हनुमानजी से रावण ने पूछा कि वे क्यों बांधे गये ? उसके उत्तर में वे कहते हैं कि पराई स्त्री के देखने के कारण । इसमें यह व्यञ्जना हुई कि मैंने तो पराई स्त्री को देखा ही है तू तो अपने घर ले पाया है, तेरी इससे भी बुरी गति होगी। यह वस्तुध्वनि का ही उदाहरण है--'कैसे बँधायौ ? जु सुन्दरि तेरी छुई हग सोबत पातक लेखो' (रामचन्द्रिका, सुन्दरकाण्ड)। ___ अलङ्कार-ध्वनि :- इसका एक उदाहरण सूर के भ्रमरगीत से दिया जाता है :- 'तब से इन सबहिन सचु पायो । जच ते हरि संदेस तिहारो सुमत ताँबरो श्रायो ।। फूले ख्याल दुरे ते प्रगटे, पवन पेट भरि खायो। . ऊँचे बैठि बिहंग-सभा बिच कोकिल मंगल गायो ।' --भ्रमरगीतसार की भूमिका (पृष्ठ ४०) ईस पद में यह दिखलाया गया है कि पहले तो राधा के सौन्दर्य के कारण उनके अङ्ग के सब उपमान–सर्प बालों के कारण, कोकिल उनकी वाणी के माधुर्य के कारण, सिंह कटि के सौन्दर्य के कारण और गजराज गति के कारण-~-लज्जित होकर छिप गये थे, किन्तु अब जबसे राधाजी योग का विषम संदेश पाने के कारण बेहोश हो गईं, वे सब उपमान प्रसन्न हैं क्योंकि अब उनको लज्जित होने की कोई बात नहीं रही । प्रतीप अलङ्कार वहाँ होता है जहाँ उपमान की हीनता या निरर्थकता दिखाई जाय या उससे लज्जित दिखाया जाय । उनके प्रकट होने और मङ्गल गाने से अभी तक की दीन-दशा जो दूर हो गई है, व्यजित होती है। इस पद में इस अलङ्कार द्वारा राधा का पूर्व सौन्दर्य फिर विरह-दशा, कृष्ण की निष्ठुरता, सहानुभूति तथा प्रेम के प्रतिदान की प्रार्थना आदि की और भी व्यञ्जनाएँ हैं । कुल मिलाकर इसमें वियोग- शृङ्गार की ध्वनि है।