पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२७५

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अभिव्यञ्जनावाद एवं कलाबाद-क्रोचे श्रीर सौन्दर्य-बोध २३६ अनदेखेई कमल चन्द, तातें मुख मुखै सखी, कमलौ न चन्द री । केशव- दासजी को भी कमल, चन्द्र इत्यादि देखने में कुछ भी अच्छे या सुन्दर नहीं लगते थे । हाँ जब वे उपमा-उत्प्रेक्षापूर्ण किसी काव्योक्ति में समन्वित होकर श्राते थे तब वे सुन्दर दिखाई पड़ने लगते थे ।' -चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में अभिव्यञ्जनाबाद, पृष्ठ १७४ तथा १७५) आचार्य शुक्लजी के प्रति मेरा पूर्णातिपूर्ण श्रद्धाभाव है क्योंकि मैं मुक्त- कण्ठ से कह सकता हूँ कि हिन्दी लेखकों में जितना शुक्लजी से मैंने सीखा हैं और किसी से नहीं किन्तु मैं नम्रतापूर्वक निवेदन करूँगा कि अलङ्कारवादी प्राचार्य केशवदासजी से क्रोचे की तुलना में उसके साथ अन्याय किया यया है। क्रोचे मुख और कमल-चन्द सब की ही सौन्दर्यानुभूति कल्पना द्वारा मानेंगे। अनुभूति का आत्मप्रकाश सौन्दर्य ही है। क्रोचे अनुभूति का तिरस्कार नहीं करते । सौन्दर्य को हम चाहे विषयगत (Objective) मानें, चाहे विषयीगत (Subjective), पर सौन्दर्य-बोध में हम कल्पना के कार्य से इन्कार नहीं कर सकते । रविबाबू ने ठीक ही कहा है-'O woman thou art half dream and half reality'.-इस सम्बन्ध में बिहारी का नीचे का दोहा कोचे के भाव की पुष्टि करता है :- "समै-समै सुन्दर सबै, रूपु कुरूपु न कोइ । मन की रुचि जेती जिते, तित तेती रुचि होइ ।।' -बिहारी-रत्नाकर (दोहा ४३२) विषयगत या वस्तुगत सौन्दर्य की क्रोचे ने नितान्त उपेक्षा नहीं की। प्राकृतिक सौन्दर्य को उसने कला या सौन्दर्यात्मक पुननिर्माण का उत्तेजक माना है। वस्तु में कुछ गुण अवश्य होगा जो सौन्दर्यानुभूति या सौन्दर्य के स्वयंप्रकाश ज्ञान की उत्तेजना देगा। क्रोचे भी ऐसी ही वात स्वीकार करते हैं :- ..'Natural beauty is simply a stimulus to nesthetic reproduction, which presupposes previous production. Without preceding aesthetic intuitions of the imagina- tion, nature cannot arouse any at all.' -Croce (Aesthetic--Nature and Art, Page 162) ____ इस अवतरण में यद्यपि कल्पना को प्रधानता दी गई है तथापि वस्तुगत सौन्दर्य की उपेक्षा नहीं की गई है। इसकी उत्तेजना बिना भी काम न चलेगा। मैं आचार्य शुक्लजी के साथ यह मानने को सोलह आने तैयार हूँ कि क्रोचे