पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२८

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दासजी ने अलङ्कारों के वर्गीकरण का भी एक गोलिक प्रयास किया है। उन्होंने समता, विरोध, शृङ्खला वा तर्क के आधार पर वकिरण नहीं किया है वरन् हर-एक वर्ग के प्रतिनिधि अलङ्कार के नाम पर पालकारों का वर्गीकरण किया है । लेकिन सब जगह एक-सा नहीं है। कुछ तो वर्ग के प्रतिनिधि में आदि लगाकर वर्गबद्ध है (जैसे उपमादि, उत्प्रेक्षादि ), कुछ स्वयं एक ही वर्ग हैं (जैसे अतिशयोक्ति बिरुद्ध आदि ) और कुछ स्फुट हैं । चतुर्वेश उल्लास में ऐसे बहुत-से अलङ्कार हैं। वे चतुर्द उल्लास के प्रारम्भ म लिखते हैं :- ... उचित अनुचितौ बात में, चमतकार लखि दास । . अरु कछु मुकक रीति लखि, कहत एक उल्लास ।' -भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (समालकारादि-धणेन, १) गुणों के सम्बन्ध में दासजी ने मम्मट का अनुकरण किया है। दशों गुणों का वर्णन कर सबको तीन में ( माधुर्य, पोज और प्रसाद में ) अन्तभुक्त बतलाया है :- 'माधुर्योज प्रसाद के, सब गुन हैं वाधीन । ताते इनहीं को गन्यो, मम्मट सुकवि प्रवीन ॥' --भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (गुण निर्णय-वर्णन, ३०) इस प्रकार हम देखते हैं कि दासजी ने बड़े कौशल के साथ 'काव्यप्रकाश' और 'साहित्यदर्पण' का समन्वय किया है और अलङ्कारों में 'चन्द्रालोक' का भी सहारा लिया है :- बूझि सुचन्द्रालोक अरु, काव्यप्रकासहु ग्रन्थ । समुझि सुरुचि भाषा कियो, लै प्रौरी कविपन्थ ।' -भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय ( मंगलाचरण-वर्णन, ५) दूलह ( रचना-काल संवत् १८०० से १८२५ तक ) का 'भाषा-भूषा'. की भांति 'कवि-कुल-कण्ठाभरण' बड़ा प्रामाणिक और लोकप्रिय ग्राथ है। इसमें ... कवित-सवयों में लक्षण और उदाहरण दिये गये हैं किन्तु यह नियम नहीं है कि एक छन्द में एक ही अलङ्कार का वर्णन हो । इसमें ११७ अलवारों का वर्णन है और अधिकांश में उदाहण शृङ्गार से अथवा राधा-कृष्ण के यश-वर्णन से सम्बन्धित हैं जो प्रवृत्ति सर्वथा रीतिकालीन प्रकृति के अनुपाल है। 'भापा- भूपन' को ही भाँनि 'कवि कुल काभरण' में भी समास गुण अधिक है :-