पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२८०

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सिद्धान्त और अध्ययन लाने की अावश्यकता नहीं है, उसके लिए न तो उसके विचारों या व्यापारों का ज्ञान और न उसके भावों से उसका परिचय ही अपेक्षित है। ___ ऐसे ही विचार ब्रेडले (13ratdly) के भी हैं और ऐसे ही वाक्य शुक्लजी के आक्षेपों के वास्तविक प्राधार हैं । तो क्या कला और नीति या उपयोगिता का कोई सम्बन्ध नहीं ? कोचे ने प्रान्तरिक अनुभूति को अभिव्यक्ति से अभिन्न माना है और उसका वाह्य अभिव्यक्ति से भेद किया है । आन्तरिक अभिव्यक्ति में कवि मजबूर हो जाता है, वाह्य अभिव्यक्ति में वह स्वतन्त्र रहता है :-- We chanot will or not will our aesthetic vision: we can, however, will or not will to externalise it, or better, to preserve and communicatce, or not, to others, the externalisation produced.' ...--Croce(Aesthetic-Techniquc incl the Arts, page 182) ___ कभी-कभी तो कवि वाह्य रूप देने में भी स्वतन्त्र नहीं रहता। इसी को तो कहते हैं सृजन की अदम्य अावश्यकता । आन्तरिक और बाह्य कला में संकल्प का व्यवधान मानकर वाह्य कला का मूल्य किसी अंश में काम हो जाता है। कलाकृतियों के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठता है कि कलाकृतियाँ कलाकार के मन में तो स्वयंप्रकाशज्ञानजन्य · अभिव्यक्तियों को जाग्रत कर देंगी किन्तु .. दर्शक, पाठक या समीक्षक के मन में वे उसी प्रकार की कोचे और अभिव्यक्ति किस तरह से उत्पन्न करेंगी ? इसके लिए साधारणीकरण पाठक को भी कलाकार के मानसिक धरातल तक उठना पड़ेगा, तभी प्रतिभा (Genius) और रचि (Tastce) का मिलान होकर कला के साथ न्याय हो सकेगा। यदि पाठक या समीक्षक कलाकार के धरातल तक नहीं पहुँचता तो वह उस कृति में सौन्दर्यानुभूति न कर सकेगा । कलाकार की मानसिक परिस्थिति में पहुँचकर एग्वि-भेद न रहेगा, ऐसा होना कठिन अवश्य है किन्तु असम्भव नहीं। ___ इस कठिनाई को हल करने के लिए क्रोचे में कवि के दो प्रकार को प्रात्म भाव (Personalities) माने हैं-~-एक लौकिया और संकल्पात्मक (Empirical and Volitional) और दूसरा अलौकिक अर्थात् स्वच्छन्द और आदर्श (Spontaneous or idextl personality constituting the work of art) | कवि और पाठक का तादात्म्य पावर्श प्रात्मभाव में हो सकता है । साधारणतया पाठक और कवि दाते (Dante) के लौकिक