पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२८२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


H INumurv.. .Me e nawan - - - - - --- -... -. .. २४२ सिद्धान्त और अध्ययन है कि क्रोचे के अभिव्यजनावाद में न तो कौतुहल को स्थान है और न वैचित्र्य को । उसमें हृदय की गम्भीर वृत्तियों का भी प्रभाव नहीं । शुक्लजी के निम्नो- ल्लिखित शब्द कम-से-कम कोचे के अभिव्यञ्जनाबाद के साथ न्याय नहीं करते :- 'अभिव्यन्जनाबाद' अनुभूति या प्रभाव का विचार छोड़ केवल वाग्वै- चित्य को पकड़कर चला है; पर वाग्वैचित्र्य का हृदय की गम्भीर वृत्तियों से कोई सम्बन्ध नहीं । वह केवल कुतुहल उत्पन्न करता है । अभिव्यन्जनाबाद के अनुसार ही यदि कविता बनने लगे तो उसमें विलक्षण-विलक्षण वाक्यों के ढेर के सिवा और कुछ न होना चाहिये-न विचारधारा, न काव्यों की रस धारा ।' -चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में रहस्यवाद, पृष्ठ ६७) यह कथन क्रोचे के अभिव्यजनावाद का विकृतीकरण है। हम अपने कथन के पक्ष में क्रोचे का पूर्वोद्धृत मत एक बार फिर उद्धृत कर देना चाहते _ 'He who has nothing definite to express may try to hicle his internal emptynass with a flood of words,... allthough, at bottomm, they convey nothing.' __-Croce (Aesthetic----Nature and Art, Page 160) क्रोचे कुतूहल और कलाबाजी के एकदम विराम था। वह अभिव्यक्ति का एक ही मार्ग मानता है जो कि सही मार्ग होता है। वह वेशव तथा अन्य अलङ्कारवादियों की भांति विकल्पों में विचरण करना नहीं जानता :-- ___ 'Spiritual activity, precisely, because it is activity, is not a caprice, but a spiritual necessity; and it cannot solve a definite' aesthetic problem, Save: in one wity, which is right way.' -Croce (Aesthetic-Taste and Art, Thge 196) कोचे न तो अलङ्कारवादी है और न वक्रोक्तिवादी । अलङ्कार के सम्बन्ध में शुक्लजी ने जो कोचे के मत का उल्लेख कोचे और किया है वह इस बात की पुष्टि करेगा। देखिए कितना अलकारवाद स्पष्ट है :-- 'अलकार के सम्बन्ध में क्रोचे कहता है कि अलङ्कार तो शोभा के लिए लिए ऊपर से जोड़ी या पहनाई हुई वस्तु को कहते हैं । अभिव्यन्जना या उक्ति में अलंकार जुड़ कैसे सकता है ? यदि कहिए बाहर से, तो उसे उक्ति से सदा