पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२८३

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अभिव्यन्जनावाद एवं कलावाद-क्रोचे और अलङ्कारवाद २४३ अलग रहना चाहिए । यदि कहिए भीतर से, तो वह या तो उक्ति के लिए 'दाल भात में भूसरचन्द' होगा अथवा उसका एक अङ्ग ही होगा।' -चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में अभिव्यञ्जनाबाद, पृष्ठ १७३) ___ क्रोचे के इस भाव की स्पष्टि के लिए इसका अंग्रेजी का उद्धरण नीचे 'One can ask oneself how an ornament can be joined to expression. Externally ? In that case it must always remain seperate. Internally ? In that case, eithter it does not assist expression and mars it, or it does form part of it and is not ornament, but a constituent element of expression, indistinguishable from the whole.' -Croce (Aesthetic-Expression and Rhetoric, ____page 113) क्रोचे के ऊपर के अवतरण से यह कदापि सिद्ध नहीं होता कि वह अल- कारों को ऊपर से जोड़ी हुई वस्तु मानता है (जैसा शुक्लजी ने उसके विषय में कहा है) । इसके विपरीत वह उनके जोड़े हुए होने के विरोध में ही युक्ति देता है अर्थात् वह अलङ्कार को उक्ति का सम्पूर्ण से पृथक् न किया जानेवाला अङ्ग ही मानता है। इस अवस्था में अलङ्कार की स्वतन्त्र सत्ता कुछ नहीं और यदि स्वतन्त्र सत्ता है तो वह निरर्थक है। क्रोचे का कथन है कि यदि रूपक से कोई बात साधारण शब्दावली की अपेक्षा अधिक उत्तम रीति से व्यजित होती है तो वही उसकी अभिव्यञ्जना है। क्रोचे तो यथार्थ अभिव्यक्ति चाहता है, चमत्कार नहीं। क्रोचे अलङ्कार और अलङ्कार्य में भेद नहीं मानता है। प्राचार्य शुक्लजी तथा 'काव्य में अभिव्यञ्जनावाद' के रचयिता श्रीसुधांशुजी क्रोचे के इस मत से कि अलङ्कार और अलङ्कार्य में भेद नहीं है, सहमत नहीं हैं। उनके मत से--अलङ्कार-अलङ्कार्य का भेद मिट नहीं सकता'---यह बात चाहे ठीक हो किन्तु क्रोचे का उपर्युक्त उद्धरण उसे अलङ्कारवादी होने के अभियोग से पूर्णतया मुक्त कर देता है। 'प्रस्तुत के मार्मिक रूप-विधान का स्याग और केवल प्रचुर अप्रस्तुत रूप-विधान में ही प्रतिभा या कल्पना का प्रयोग' (ये शब्द शुक्लजी के हैं)---यह प्रवृत्ति हिन्दी में चाहे कहीं से प्राई हो ( सम्भव है अपने यहाँ के ही अलङ्कारवादियों की देन हो ) किन्तु क्रोचे से नहीं आई।