पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२८५

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अभिव्य जनावाद एवं कलावाद-क्रोचे और साधारणीकरण २५३ हाँ, वह अवश्य है और इसीलिए उसको नीति तथा सदाचार के बन्धन में अाना पड़ता है। ____ योरोप में रस्किन, टाल्स्टाय, आई० ए० रिचर्ड्स काव्य का नीति से सम्बन्ध मानते हैं। ब्रेडले साहब यद्यपि कलावादी हैं तथापि उन्होंने काव्य में कोरे आकार (Form) को महत्त्व नहीं दिया है। वे तो पूरे काव्य को महत्त्व देते हैं जिसमें सामग्री और प्राकार दोनों सम्मिलित हैं। दोनों का पार्थक्य नहीं हो सकता । वे शैली और अर्थ दोनों को महत्त्व देते हैं किन्तु दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं मानते । वे एक प्रकार से 'वागर्थाविव सम्पक्तौ' तथा 'गिरा अरथ जल-बीच सम, कहियत भिन्न न भिन्न' के मानने वाले हैं । काव्य का अर्थ काव्य के बाहर नहीं रहता । काव्य को चाहे अभि- व्यञ्जक अर्थ कहिए और चाहे अर्थपूर्ण शैली---- 'So that what you apprehend may be called indifferently an expressed meaning or a significant form.' वेडले ने काव्य और जीवन को दो समानान्तर दिशामों में चलता हना बतलाया है। जीवन में वास्तविकता है, कल्पना नहीं; काव्य में कल्पना है किन्तु वास्तविकता की कमी रहती है । मम्मट ने भी तो काव्यप्रकाश की पहिली कारिका में काव्य को ब्रह्मा की सष्टि के नियमों से परे माना है-'नियतिकत नियमरहिताम्'--और उसे 'अनन्य- परतन्त्राम्' भी कहा है। प्राचार्य शुक्लजी ने ग्रेडले के विरुद्ध रिचर्ड्स को महानता दी है। विश्वनाथ और मम्मट:-हमारे यहाँ भी यह प्रश्न दूसरे रूप से उठा है । अश्लीलत्व दोष माना ही जाता है । कहा जाता है कि कालिदास को 'कुमार- सम्भव' में पार्वती-परमेश्वर के (जिनकी वन्दना उन्होंने 'रघुवंश' के आदि में की है) शृङ्गार-वर्णन के कारण कुष्ट हो गया था और शायद इसी कारण उनका ग्रन्थ भी अपूर्ण रहा । किन्हीं प्राचार्यों ने यह भी लिखा है कि अच्छे कवियों का संसर्ग पाकर अनौचित्य भी औचित्य हो जाता है, ऐसे प्राचार्य कलावादी ही कहे जायेंगे । पण्डित उदयशङ्कर भट्ट ने 'कुमारसम्भव' नाम के नाटक में कला और प्राचार का संघर्ष दिखाकर प्राचार के ऊपर कला की विजय कराई है। स्वयं सरस्वती देवी ने कला का पक्ष लिया है, यह कलावाद का प्रभाव है। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ और काव्यप्रकाशकार मम्मट दोनों ही ने कालिदास को प्रकृति-विपर्यय का अर्थात् दिव्य प्रकृतियों के शृङ्गार वणन का दोषी ठहराया है। साहित्यदर्पणकार ने रस. और भाव के अनौचित्य को ही भावाभास और रसाभास कहा है-'अनौचित्यप्रवृत्तत्व अाभासो रसभावयोः' (साहित्यदर्पण,