पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२८८

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१८ : समालोचना के मान 'स्थामी मिन्नं च मंत्री च शिष्यश्चार्य एष ध, कर्भवति हि चिन्न किं हि सद्यन्न भावकः ।' -- काव्यमीमांसा मालोचना शब्द 'लुच' धातु से, जिसका अर्थ देखना है, बनी है। यह वही धातु है जो 'लोचन' शब्द में है । समीक्षा का भी यही अर्थ है। ___राम्यक् प्रकार से देखने में वस्तु या कृति का प्रभाव व्युत्पत्ति और प्रास्वाद, उसकी व्याख्या और उसका शास्त्रीय तथा उद्देश्य नैतिक मूल्याङ्कन सभी बातें आजाती हैं। बालोचक समाज का प्रतिनिधि बन कृति को देखता है, समाज को उसके मूल्यतम तथ्यों से परिचित कराता है और लोकहित की दृष्टि से उसका मूल्याङ्कन कर लेखक को भी दिशा-निर्देश करता है। पालोचका लेखक और पाठक के बीच में दुभाषिये-का-सा काम करता है और समाज तथा कलाकारों को पारस्परिक सम्पर्क में लाकर लेखक के साथ ही नये बिनारों श्रीर' गावों को चलन देने में सहयोग प्रदान करता है । आचार्य राजशेखर ने भावयित्री प्रतिभा (अर्थात् पालोचक की प्रतिभा) का उद्देश्य बतलाते हुए लिखा है :- 'सा च कवेः श्रममभिप्रायं च भावयति । नया खलु फलितः कवेयापारतरुः अन्यथा सोऽयकेशी स्यात् ।' --काव्यमीमांसा अर्थात् वह कवि के श्रम और उसके उद्देश्य तथा तातार्य को प्रकाश में लाता है । उसके (भावक की प्रतिभा के) ही कारण कवि के व्यापार का वृक्षा फलता है अर्थात् उसके उद्देश्य की सिद्धि होती है अन्यथा वह निष्फल रहती है। भावक के ही सहयोग से कवि की प्रतिभा प्रकाश में ग्राती है और उसके विचारों और भावों का प्रसार होता है । मेथ्यू पार्नल्ड (Mathew Arnolcl) ने भी आलोचना का कार्य ऐसा ही माना है :-- _ 'Simply to know the best that is known and thought १. अर्थात् स्वामी, मित्र, मन्त्री, शिष्य और प्राचार्य-ऐसा कौनसा सन्बन्ध है जो भावक या पालोचक का कवि के साथ नहीं होता।