पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२९

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. ( २५ ) 'अभिप्राय सहित विशेषण जहाँई. होय,. तहाँ परिकर कवि दूलह गनाई है। वृन्दावन चंद नंद-नंद घनश्याम देखौ, . श्रानि इन आँखिन की तपन बुझाई है।' -कवि-कुल-कण्ठाभरण (छन्द २६) आधे में परिकरांकुर का लक्षण और उदाहरण है। कहीं-कहीं 'चन्द्रालोक' की भी छाया है किन्तु बहुत कम, जैसे तद्गुण के उदाहरण में :-- . . 'ओठन में श्रीप पाली बेसरि के मूंगा भए'.... -कवि-कुल-कण्ठाभरण (छन्द ६६) 'पद्मरागारुणं नासामौक्तिक तेऽधराश्रितम' --चन्द्रालोक (११०२) पद्माकर (जन्म-संवत् १८१० ). की विशेषता यह है कि इनके आ- चार्यत्व ने इनके कवित्व को दबाया नहीं है। इनके उदाहरण एक-से-एक ... सरस हैं। इनका 'जगद्विनोद' रसशास्त्र के प्रारम्भिक पाकर विद्यार्थियों का कण्ठहार हैं। इसमें यद्यपि शृङ्गार के अन्तर्गत हाव-भाव और नायिका-भेद की ही प्रधानता है तथापि और रसों का भी, जैसा हिन्दी के सब कवियों ने किया है, चलता हुमा वर्णन है । 'पद्माभरण' इनका अलङ्कार-ग्रन्थ है । यह ग्रन्थ भी चन्द्रालोक' से प्रभावित है । उदाहरणस्वरूप 'जगद्विनोद' की स्थायीभाव और, रस की परिभाषाएँ देखिए:-.. रस अनुकूल विकार जो, उर उपजत हैं प्राय। ..: ... थाई भाव बखानहीं, तिनहीं को : कवि रायः ॥ .:. है सब भावन में सिरे, टरति न कोट उपाय । है परिपूरन होत रस, तेई थाई भाव ॥' -भाकर पन्चामृत (जगहिनोद, छन्द ५७२ तथा ५७३) अलङ्कार का उदाहरण :- 'सुद्धापन्हुति जहं थपे, सुद्ध वस्तु छपि जात। . यह न ससी तो है कहा ? नभगंगा जलजात ।। -पभाकर पन्चामृत (पमाभरण, छन्द ४५) छापे की कलों के प्रचार के लिए गद्य की प्रतिष्ठा बढ़ी और हिन्दी ' में भी अलङ्कार-शास्त्र के गम्भीर विवेचन का सूत्रपात हुआ। भारतेन्दुजी ने