पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२९१

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अभिव्यन्जनावाद एवं कलाबाद-कलाबाद की व्यख्या और अन्य मत २५१ है । उस समय सुन्दरता के लिए हम सत्य का बलिदान नहीं करते। दर्शन- शास्त्र या गणित-शास्त्र के लोहे के चने चबाते समय हम उनमें कविता का रस न पाकर उन शास्त्रों को हेय नहीं समझते । धर्म में घोर तप और संयम का विधान देख कर हम उसे सौन्दर्य के मापदण्ड से नहीं नापते, फिर बिचारी कला को सत्य और नीति के शासन में क्यों जकड़ा जाय ? ____ पास्कर वाइल्ड और स्पिन्गर्न :-ऐसी ही विचारधारा में पड़कर 'पास्कर वाइल्ड' (Oscar Wilde) ने जिन्होंने स्वयं अपनी कृतियों में सदाचार की अवहेलना की है, कहा है-'समालोचना में सबसे पहली बात यह है कि समालोचक की यह परख हो कि कला और प्राचार के क्षेत्र पृथक- पृथक है' । (चिन्तामणि : भाग २, काव्य में अभिव्यञ्जनावाद, पृष्ठ १८५)। जे० ई० स्पिन्गन (J. E. Spingarn) ने इसी बात को जरा हास्यभित भाषा में कहा है --'शुद्ध काव्य के भीतर सदाचार-दुराचार ढ ढ़ना ऐसा ही है जैसा कि रेखागणित के समत्रिकोण त्रिभुज को सदाचारपूर्ण कहना और समद्विबाहुत्रिभुज. को दुराचारपूर्ण ।' ( चिन्तामणि : भाग २ काव्य में अभिव्यन्जनावाद पृष्ठ १५५) . 'To say that poetry as poetry is moral or immoral is as meaningless to say that an equilateral triangle is moral and an icosceles triangle immoral.' - जोशीजी :-हमारे हिन्दी लेखकों में श्रीइलाचन्द जोशी भी इसी मत के अनुयायी है, देखिए :-- . 'विश्व की इस अनन्त सृष्टि की तरह कला भी प्रानन्द का ही प्रकाश है। उसके भीतर नीति, तस्व अथवा शिक्षा का स्थान नहीं। उसके अलौकिक मायाचक्र से हमारे हृदय की तन्त्री श्रानन्द की कार से बज उठती है. यही हमारे लिए परम लाभ है । उच्च अङ्ग की कला के भीतर किसी तत्व की खोज करना सौन्दर्य-देवो के मन्दिर को कलुषित करना है। -साहित्य-सर्जना (कला और नीति, पृष्ठ १५) डाक्टर रवीन्द्रनाथ ठाकुर:-रवि बाबू सौन्दर्य को प्रयोजनरहित मानते हुए भी उसके पूर्ण विकास को मङ्गलमय मानते हैं । मङ्गल में उपयोगिता के साथ सौन्दर्य की भावना रहती है वह सौन्दर्य उपयोगिता के परे को वस्तु है। वे सौन्दर्य को स्वार्थ की तुच्छ भावना से ऊँचा रखना चाहते हैं किन्तु वे सौन्दर्य- ... बोध के लिए संयम आवश्यक मानते हैं, देखिए :---- . 'सौन्दर्य ने हमारी प्रवृत्तियों को संयत कर दिया है। उसने संसार के