पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२९३

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समालोचना के मान-समालोचक के अावश्यक गुण २५७ is the world, and by in its turn making this known, to create a current of true and fresh ideas.' -Essays in Criticism, 1 (page 18) अर्थात् पालोचना का कार्य केवल उत्तमोत्तम जो बातें जानी गई हैं उनका जानना और बदले में उनको दूसरों के लिए जनाना और इस प्रकार सच्चे तथा ताजा विचारों का प्रवाह उत्पन्न कर देना है। अालोचना का यह मुख्य उद्देश्य है, किन्तु इसके "साथ कवियों वा लेखकों के गुण-दोषों का विवेचन वा उन आदर्शी और सिद्धान्तों का बतलाना भी जिनके अनुकूल कवि लोग अपनी रचनाएँ करें, आलोचक के कार्यों में से है । ये ही आलोचना के उद्देश्य और प्रकार हैं। पालोचनाएँ भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हुई भी उनका मूल उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से प्रास्वाद कर पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना, उनकी रुचि को परमार्जित करना एवं साहित्य की गति-विधि निर्धारित करने में योग देना है। यह ऊपर बतलाया जा चुका है कि आलोचक का उत्तरदायित्व कवि और पाठक दोनों के प्रति है। इस प्रकार उसका भार कवि के बोझ से भी अधिक बोझिल है। इस भार के निर्वाह के लिए समालोचक के उसमें कुछ गुण अपेक्षित हैं। उनमें सबसे पहला गुण है, आवश्यक गुण आलोच्य विषय का पूरा-पूरा ज्ञान । आलोचक ने चाहे लिखा न हो किन्तु उसमें स्वयं उस विषय को भली प्रकार समझने और समझाने की योग्यता होनी चाहिए। ऐसा कहा गया है कि जो लोग लेखक होते हैं वे मत्सरी हो जाते हैं :- 'यः सम्यग्विविनक्ति दोषगुणयोः सारं स्वयं सत्कविः सोऽस्मिन् भावक एव नास्त्यथ भवे हे चान्न निर्मस्वरः ।' -काव्यमीमांसा अर्थात् जो सत्कवि स्वयं दोष-गुण का सार जानता है वह भावक नहीं होता और यदि होता है तो मात्सर्यरहित . नहीं होता तथापि हमको यह भी ध्यान रखना चाहिये कि---'विद्वानेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम्' -विद्वान् ही विद्वान् का परिश्रम जानता है । दूसरा गण जो समालोचक में आवश्यक है वह . सहृदयता और सहानुभूति का है । समालोचक को कवि या लेखक के ही दृष्टि- कोण से उसकी कृति में प्रवेश करने की आवश्यकता होती है । तुलसीदास के ग्रन्थों के मूल्याङ्कन के लिए भक्तहृदय अपेक्षित है। पालोचक को भी अपना दृष्टिकोण लेखक के दृष्टिकोण से मिला लेने की आवश्यकता रहती है। तीसरा