पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२९४

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सिद्धान्त और अध्ययन गुण आलोचक में निष्पक्षता का होना आवश्यक है। उसको रचयिता के प्रति कोई पूर्वग्राह न होना चाहिए। उसका सम्बन्ध कलाकार से नहीं वरन् कृति से होना चाहिए । निष्पक्ष पालोचक ही मत्सरताशून्य हो सकता है। हमारे यहाँ मत्सरता के अभाव पर बड़ा बल दिया गया है । अन्तिम बात जो आलोचक में वाञ्छनीय है वह है अपने विचारों और प्रभावों को कौशल के साथ अभिव्यक्ति करने की शक्ति । आलोचक स्वयं भी अपनी कला के सम्बन्ध में कलाकार होता है । शुक्लजी की सफलता का बहुत-कुछ रहस्य उनकी कुशल अभिव्ययित में ही था । संक्षेप में हम कह सकते हैं कि कवि में सहानुभूतिपूर्ण अनुभूति के साथ कुशल अभिव्यक्ति का होना आवश्यक है। कविवर रत्नाकर में 'Popes Essays on Criticism' के आधार पर लिखे हुए समालोचनादर्श में अालोचक के गुण इस प्रकार गिनाये हैं :--- 'सके दिखाय मित्र कौं जो तिहि दोष असंस, श्री सहर्ष सन्नहुँ के गुन को भाषि प्रसंसै ? धारै रस अनुभव जथार्थ, पै नहिं इक अंगी, ग्रंथनि को नौ मनुष-प्रकृति को ज्ञान सुढेगी, अति उदार पालाप, हृदय अभिमान-बिहीनी, श्री मान सहित प्रमान प्रसंसा रुचि सौं भीनी । पहिले ऐसे रहे विवेचक ऐसे सचितमन आर्यवर्त मैं भए सुभग जुग मैं कतिपय.जन ।' -रत्नाकर : पहला भाग (काशी ना० प्र० सभा, पृष्ठ ४७) . भिन्न-भिन्न लेखकों और समालोचकों ने समालोचना के भिन्न-भिन्न पक्षों पर बल दिया गया है-किसी ने गुरण-दोष-विवेचन पर तो किसी ने ___ व्याख्या पर ।.इन्हीं उद्देश्यों और प्रादर्शो पर पालोचना के समालोचना प्रकार अवलम्बित रहते हैं। आलोचनाओं के वर्गीकरण के प्रकार में कुछ लोग मनोवैज्ञानिक क्रम को महत्त्व देते हुए प्रभावात्मक आलोचना को पहले रखते हैं ( जैसा इरा पुस्तक में है ) और कुछ लोग तार्किक क्रम को महत्त्व देते हुए सैद्धान्तिक आलोचना को प्राथमिकता देते हैं। सभी प्रकार की आलोचनाएँ अपना-अपना महत्त्व रखती हैं। आलोचना के मुख्य चार प्रकार हैं-----(१) सैद्धान्तिक पालोचना, जिसमें काव्य के आदर्श और विभिन्न रूपों के शिल्पविधान पर विवेचन किया जाता है, (२) निर्णयात्मक पालोचना, जिसमें उन नियमों के आधार पर गुण-दोष-विवेचन की तथा श्रेणीबद्ध करने की प्रवृत्ति रहती है,