पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२९७

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समालोचना के मान-~सैद्धान्तिक पालोचना विश्वास रख अपनी रुचि को ही अन्तिम प्रमाण मानते हैं। प्रभाववादी आलोचक भी दुष्यन्त की भाँति कहता है :---- - 'सनां हि संदेहपदेषु वस्तुषु प्रमाण मन्तःकरणप्रवृत्तयः' -अभिज्ञानशाकुन्तल (१।२१) अर्थात् सन्देहास्पद स्थलों में सज्जनों के लिए अन्तःकरण की वृत्ति ही प्रमाण है । यह रुचि जितनी लोकरुचि के साथ सामञ्जस्य रखती है और जितनी सुसंस्कृत तथा परिमार्जित होती है उतनी ही उसमें 'भिन्नःरुचिहिलोका' की अनिश्चयता नहीं रहती है । विषयीप्रधान भिन्नरुचिता इस प्रकार के मान- दण्ड का मुख्य दोष है । इसमें महफिली दाद और 'वाह ! वाह ! की प्रवृत्ति रहती है । लेखक ने तो कलम तोड़ दी', 'गजव का लेखक है'---पण्डित पद्मसिंह शर्मा में भी कहीं-कहीं यही प्रवृत्ति प्रागई है। 'बिहारी सतसई' के दोहे तो शक्कर की रोटी हैं, जिधर से तोड़ी उधर से ही मीठे हैं'---ऐसे वाक्य इसी प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। सूरदासजी की प्रशंसा में निम्नलिखित दोहा भी इसका अच्छा उदाहरण है :- 'किधौं सूर को सर लग्यो किधौं सूर की पीर । किधौं सुर को पद लग्यो बेध्यो सकल सरीर ।। इसी प्रकार का एक श्लोक भी है जो यह बतलाता है कि वह कविता क्या और वह बनिता क्या जिसके पद-विन्यास से (कविता के सम्बन्ध में शब्दों का संयोजन और बनिता के सम्बन्ध में गति-विलास) मन प्रभावित न हो :- 'तया कवितया किंवा, तया बनितया च किम् । पदविन्यासमानण, यया न संग्रहीयते मनः ॥' जब लोकरुचि सूत्रबद्ध हो जाती है और युगप्रवर्तक कवियों की अमर रच- नाओं का विश्लेषण कर उनके नमूने के आधार पर सिद्धान्त और नियम निर्धा- रित किये जाते हैं तब सैद्धानिक मालोचना का जन्म होता सैद्धान्तिक अालोचना है । लक्ष्य ग्रन्थों के पश्चात् ही लक्षण-ग्रन्थों का निर्माण होता है। भाषा के बाद ही व्याकरण का उदय होता है। हमारे राजकीय नियम और कानून लोकरुचि और लोकसुविधा के व्यवस्थाप्राप्त १. कहीं-कहीं दूसरी पंक्ति का पाठ है-- 'किधौं सूर को पद सुन्यौ, तन मन धुनत सरीर ॥