पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२९९

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समालोचना के मानव्याख्यात्मक पालोचना २६३ को ही महत्ता दी है। वे प्रचलित लोकमत के पक्ष में न थे। उनका कहना है कि पुराने-मात्र होने के कारण कोई काव्य अच्छा नहीं हो सकता और न नया होने के कारण उपेक्षणीय होता है । सन्त लोग परीक्षा के बाद अपना मत निश्चित करते हैं । मूढ़ लोग आपना मत दूसरों के विश्वास पर बना लेते हैं :- "पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् । सन्तः परीचयान्यतरद्धजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥' -माल विकाग्निमित्र (१।२) हमारे यहाँ के सैद्धान्तिक पालोचना के ग्रन्थों में गुण-दोषों तथा रीतियाँ आदि के विवेचन में उदाहरणस्वरूप दूसरे ग्रन्थों के इलोकों की भी आलोचना हो जाती थी। योरोप में 'पेरेडाइज लौस्ट' (Paradise Lost) आदि महा- काव्यों की अरस्तु के बतलाये हुए नियमों तथा यूनानी महाकाव्यों के आदर्श पर पालोचना हुई थी। हिन्दी में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा मिश्रबन्धुनों ने बहुत-कुछ शास्त्रीय पद्धति पर निर्णायात्मक ढङ्ग से ही मालोचना की है । प्राचार्य महावीर प्रसादजी अपनी कालिदास की निरंकुशता नाम की पुस्तक के सम्बन्ध में लिखते हैं :---- ... 'कालिदास की निरंकुशता नाम के लेख में शब्द, अर्थ और रस-कालुष्य के कई उदाहरण दिये गये हैं। काव्य के गुण-दोषों के सम्बन्ध में और भी कितनी ही बातों का विचार उस लेख में किया गया है।' -रसज्ञ-रंजन (पृष्ठ २७) निर्णयात्मक पालोचना को शास्त्रीय आलोचना भी कहते हैं। इस प्रकार की आलोचना में शास्त्रीय पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग होता है। . . यद्यपि निर्णयात्मक आलोचना प्रात्मप्रधान आलोचना की वैयक्तिक रुचि के कारण पाई हुई अनिश्चयता को किसी मात्रा में दूर कर देती है तथापि . प्राचीन नियमों की स्थिरता के कारण वह साहित्य की व्याख्यात्मक आलोचना प्रगति में बाधक होती है और उसके आधार पर की हुई आलोचना नई कृतियों के साथ पूरा न्याय नहीं करती । लक्ष्य ग्रन्थों के पश्चात् ही लक्षण-ग्रन्थों का निर्माण होता है । अरस्तू ने अपने समय के नाटकों के आधार पर ही नियम बनाये थे। यदि उसके नियमों पर शेक्सपीयर के नाटकों को परीक्षा की जाय तो वे ठीक न उतरेंगे। यूनानी नाटकों का सङ्कलनत्रय (Three Unities) के नियम का निर्वाह - शेक्सपीयर के 'टेम्पैस्ट' और शायद एक और नाटक में ही हो सका था किन्तु इस कारण उसके अन्य नाटक हेय नहीं कहे जा सकते । अाजकल सङ्कलनत्रय