पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/३०१

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समालोचना के मान-व्याख्यात्मक आलोचना दस या पन्द्रह क्यों नहीं ? वृक्ष बढ़ता रहे तो पत्तियों की गिनती से क्या मतलब ? आग जलती रहनी चाहिए उसकी ज्वालाएँ अपना रूप अाप सम्हाल लेंगी। संकलनत्रय से क्या लाभ ? जब कि मनुष्य का स्वभाव ही है कि उनको तोड़े। 'Five acts to a play And why not fifteen ? why not ten ? or seven ? What matter for the number of the leuves, Supposing the tree lives and grows ? exact The literal unities of time and place, When it is the essence of passion to ignore Both time and place ? Absurd keep up the fire, And leave the generous flames to scape themselves'. --Elazabeth Barret Brouning quoted by __ Worsfold in the Principles of Criticism (page 234.) यद्यपि नियम भी निराधार नहीं होते, वे लोकरुचि के परिचायक होते हैं तथापि उनको पत्थर की लीक बनाना उचित नहीं है। इस प्रकार आलोचना के मान बदले । प्रगतिशील साहित्य को नियमों की लौह शृङ्खला में बाँधने की कठिनाई के कारण आलोचना के मान लचीले बनाये गये। आलोचना का आदर्श शास्त्रीय नियमों के आधार पर निर्णय देने का न रहकर कवि के आदर्शों को ही प्रधानता देना होगया। पालोचक के सामने अब यह प्रश्न है कि कवि का क्या उद्देश्य था, वह क्या कहना चाहता था और उसने अपने उद्देश्य का किस प्रकार निर्वाह किया। इसके साथ यह भी प्रश्न उठता है कि जो कुछ वह कहना चाहता था, वह कहाँ तक कहने योग्य था, इसका भी उल्लेख हुआ' किन्तु इस पर महत्त्व पीछे ही मूल्य-सम्बन्धी आलोचना में दिया गया । इस प्रकार की कवि या १. एक अंग्रेजी लेखक Walter Savage Landor ने लिखा है :- "We are out to consider a foolish man has succeedled in a foolish undertaking. We are to consider whether his production is worth anything, and why it is, or why it is not !' -Shipley's Quest of Literature (Page 160 से उद्धृत)