पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/३०९

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समालोचना के मान-मूल्य-सम्बन्धी बालोचना २७३ उद्देश्य आत्मानों को बचाना नहीं वरन् बचाने योग्य बनाना है। हमारे यहाँ तुलसी का ध्यान बनाने की ओर अधिक रहा है। सूर का ध्यान जीवन की माजीवता दिखाकर उसे बचाने योग्य बताने की ओर अधिक रहा है। यहाँ तक तो बात ठीक है । ब्रेडले आदि केवल मनोवृत्ति पर ही ध्यान रखते हैं, सा भी सक्रिय रूप से नहीं और न जीवन और क्रिया पर ----'That the end of life is Contemplation being as distinct from doing'-~~-विचारों की पूर्ण परिणति, क्रिया में ही है किन्तु विचार भी यदि ठीक हो सके तो क्रिया पर प्रभाव न पड़ेगा। दिक्कत इस बात को है कि ये लोग 'मनः पूर्त समाचरेत्' अर्थात् मन को भी पवित्र करने की अधिक फिक्र नहीं करते हैं। यदि इसकी भी फिक्र करें तो कलावाद और मूल्यवाद का विशेष अन्तर न रह जाय । कलावादी में नेडले आदि पर रिचर्ड्स की यही आपत्ति है कि इन लोगों ने काव्य के सौन्दर्यपक्ष को बिल्कुल अलग माना है किन्तु वास्तविक जीवन में सौन्दर्य और नीति के कक्ष कबूतरों के खाने की भाँति अलग नहीं रक्खे जा सकते हैं । काव्य भी जीवन की तरह संश्लिष्ट होकर ही रह सकता है। अाजकल के मूल्यवादियों में आई. ए. रिचर्ड्स का स्थान प्रमुख है। हमारे यहाँ भाचार्य शुक्लजी ने भी लोक-संग्रह का पक्ष लेकर मूल्य का समर्थन किया है। इन दोनों प्राचार्यों में अंतर यह है कि जहाँ पाई० ए० रिचर्ड्स ने आन्तरिक वृत्तियों के सामञ्जस्य पर जोर दिया है वहाँ शुक्लजी के आन्तरिक वृत्तियों के साथ समाज के वाह्य सामञ्जस्य को भी अपना ध्येय बनाया है। रिचर्ड्स ने वाह्य पक्ष की उपेक्षा नहीं की है किन्तु शुक्लजी ने बराबर उस पर बल नहीं दिया है । शुक्लजी ने व्यक्ति की अपेक्षा समाज पर अधिक ध्यान रक्खा है । रिचर्ड्स ने इन प्रवृत्तियों ( Impulses) में श्रेणी-विभाग भी माना है और महत्त्व की कसौटी यह रखी है कि किस प्रवृत्ति की रुकावट या कुण्ठा से और दूसरी प्रवृत्तियों की कुण्ठा किस मात्रा में होती है ? यदि कम मात्रा में होती है तो वह महत्त्वपूर्ण है और अधिक मात्रा में होती है तो न्यून महत्त्व की है । जो साहित्य उस महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति को पोषण करेगा वह ....... १. The business of the poet is not essentially to save souls, but to make them worth saving'. -Quoted by Shipley in 'The guest for Literature'. . ( Page 178)