पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/३२

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(२८) पृष्ठ ४७)। इससे प्रकट होता है कि आचार्य द्विवेदीजी का दृष्टिकोण व्यावहा- रिक और उपदेशात्मक था ये कविता को जनता की वस्तु बनाना चाहते थे फिर भी वे रस और चमत्कार के पक्षपाती थे :- . 'शिक्षित कवि की उक्तियों में चमत्कार का. होना परमावश्यक है। यदि कविता में चमत्कार नहीं-कोई विलक्षणता नहीं तो उससे ग्रानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। -रसज्ञ-रजन ( पृष्ठ २६) आलोचना-शास्त्र पर सबसे पहला क्रमबद्ध ग्रन्थ डाक्टर श्यामसुन्दर- दासजी ( संवत् १६३२-२००२ ) का 'साहित्यालोचन' है ( उसका पहला . संस्करण संवत् १९७६ में हुआ था)। यद्यपि उसमें प्राचार्य मौलिक अंश बहुत कम है तथापि वह एक प्रकार से श्यामसुन्दरदासजी सर्वाङ्गपूर्ण है । इसमें भारतीय तथा विदेशी काव्य-शास्त्र- . सम्बन्धी विचारों का संग्रह है । उन विचारों में न तो सामञ्जस्य-स्थापन करने का प्रयत्न है और न उनका मूल्याङ्कन हुआ है। पाश्चात्य पद्धति के अनुसार काव्य का कलाओंके अन्तर्गत ही विवेचन हुआ है ( इस प्रकार के विवेचन के औचित्य या अनौचित्य पर विचार नहीं किया गया है )। बाबूजी ने यद्यपि हेगिल का नाम नहीं दिया है तथापि उनका वर्गीकरण हेगिल का ही वर्गीकरण है। इलाहाबाद के 'विद्यार्थी के प्रारम्भिक अङ्गों में इन पंक्तियों के लेखक ने एक लेख 'हेगिल के कला विभाजन' पर छपाया था । यह 'साहित्यालोचन'. से पहले निकला था। बाबू जी ने कविता की परिभाषामों में प्राचार्य मम्मट की परिभाषा को महत्ता दो है किन्तु रस का विवेचन स्वतन्त्र रूप से किया है (असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग पध्वनि के अन्तर्गत नहीं ) । वास्तव में बाबूजी ने ध्वनि को कोई महत्ता नहीं दी। व्यञ्जना का वर्णन भी परिशिष्टरूप से नागरी-प्रचारिणी पत्रिका से उद्धृत किया गया है, वह पुस्तक का अङ्ग नहीं है और नवीनतत् संस्करण में वह भी निकाल दिया गया है। बाबू जो ने यो भारतीय सनोशा-शास्त्र की यम-तत्र श्रेष्ठता दिखाने का प्रयत्न किया है तथापि उन पर व्यापक प्रभाव अंग्रेजी समीक्षा-शास्त्र का ही है । उन्होंने काव्य का बाह्य, विषयक और भावात्मक के रूप में जो विभा. जन किया है वह भो पाश्चात्य प्रणालो से ही प्रभावित है । जिस समय बाजी ने लिखा था उस समर भारतीय समोशा-शास्त्र का इतना अध्ययन नहीं हुमा था जितना कि अब हो रहा है। पहले वर्गीकरण की अपेक्षा माद के परिय- द्वित संस्करणों में बहुत-कुछ भारतीयता का पुट भागया है किन्तु मूल बांचा