पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/४१

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काव्य की श्रात्मा-विभिन्न सम्प्रदाय पण्डित मानने वाला वह व्यक्ति अग्नि को उष्णताहीन क्यों नहीं कहता :- 'श्रङ्गीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती। असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती ॥' -चन्द्रालोक (1) यहाँ पर 'अनलंकृतो' में सभङ्ग यमक का चमत्कार है पहली पंक्ति में 'अनलंकृती' का अर्थ है अलङ्कार-रहित और दूसरी पंक्ति में 'श्रनलं' और ‘कृती' अलग-अलग हैं। 'अनल' का अर्थ अग्नि है और 'कृती' का अर्थ है कार्यशील विद्वान् । इसमें मम्मटाचार्य (१२ वीं शताब्दी) की दी हुई काव्य की परिभाषा में आये हुए 'अनलंकृती पुन: क्यापि' वाक्यांश पर करारा व्यङ्गय है । भाभह (छटी अथवा ७ वीं शताब्दी) ने कहा है :- 'न कान्तमपि निभूषं विभाति वनितामुखम्' -काव्यालङ्कार (१।१३) ___ अर्थात् सुन्दर होते हुए भी प्राभूषणों के बिना बनिता का मुख शोभा नहीं देता। इसी स्वर में स्वर मिलाते हुए हमारे. केशवदासजी (१७ वीं शताब्दी) ने भी कहा है :- 'जदपि सुजाति सुलक्षणी, सुवरन सरस सुवृत्त । भूषण बिन न विराजई, कविता बनिता मित्त ।' -कविप्रिया (कविता-अलङ्कार-वर्णन १) इसमें 'कविता', 'बनिता' और 'मित्र' के लिए ऐसे विशेषण दिये गये हैं जो श्लेष द्वारा दोनों के सम्बन्ध में लागू हो सकते हैं। 'सुवरन' का अर्थ 'कविता' के पक्ष में सुन्दर अक्षर वाला और 'बनिता' तथा 'मित्र' के पक्ष में अच्छे वर्ण (रङ्ग) वाले और इसी प्रकार 'सुवृत्त' का 'कविता' के पक्ष में अच्छे छंद वाली और 'बनिता' तथा 'मित्र' के पक्ष में अच्छे चरित्र वाले होगा। ऐसे प्राचार्यों ने, विशेषकर केशव ने अलङ्कार शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत कर दिया है। केशव ने अलङ्कारों में वर्ण्य विषय भी शामिल कर लिये हैं। प्राचार्य वामन (६ वीं शताब्दी) ने 'गुणों को शोभा के कारण' माना है और 'अलङ्कारों को शोभा को अतिशयता देने वाला. या बढ़ाने वाला' कहा है । यह बात नीचे के अवतरणों से स्पष्ट हो जायगी :- 'काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मागुणाः। 'तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः । -काव्यालङ्कार (३।१।१,२) साहित्यदर्पण कार प्राचार्य विश्वनाथ (१४ वीं शताब्दी) ने भी 'अलङ्कारों