पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/४२

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सिद्धान्त और अध्ययन को शब्द और अर्थ के अस्थिर धर्म' कहा है और उनको नावच आदि की भाँति शोभा को बढ़ाने वाले तथा रस के उपकारक' माना है :---- 'शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिन।। रसादीनुपकुर्वन्तोऽलङ्कारास्तेऽङ्गन्दादिवत् ॥' -साहित्यदर्पण (१०।१) . जब गांठ की शोभा होती है तभी अलङ्कार उसे बढ़ा सकते हैं अथवा यों कहिए कि शोभावान् वस्तुओं के साथ ही अलङ्कार सार्थक होते हैं। दण्डी ने इनको 'शोभा का कर्ता' माना है । - जब तक अलङ्कार भीतरी उत्साह के द्योतक होते हैं तब तक तो वे शोभा के उत्पन्न करने वाले या बढ़ाने वाले कहे जा सकते हैं किन्तु जब वे रूढ़ि या परम्परा-मात्र रह जाते हैं तभी वे भाररूप दिखाई देने लगते हैं । अलङ्कारों का महत्त्व अवश्य है किन्तु वे मूल पदार्थ का स्थान नहीं ले सकते हैं । 'अग्नि- पुराण' में रस को काव्य का जीवन लिखा है :----

'वाग्वैदग्ध्यप्रधानेऽपि रसएवात्रजीवितम्'

-अग्निपुराण (३३७।३३) किन्तु उसी ग्रन्थ में अर्थालङ्कार-प्रसङ्ग में यह भी कहा है कि ... 'अर्थालक्षाररहिता विधवेव सरस्वती' . --अग्निपुराण (३४१२) इस बात को स्वीकार करते हुए भी हमको यह कहना पड़ेगा कि निधि से विधवा होकर भी जीवित रहना श्रेयस्कर है (प्राचीन आदर्शों के अनुकूल ऐसा नहीं है) । स्वाभाविक शोभा के होते हुए रूपवान् के लिए कोई भी वस्तु अलङ्कार बन जाती है :- 'सरसिज लगत सुहावनी जदपि लियो ढपि पंक। ...... कारी रेख कलंक हू' लसति कलाधर अंक ।। . पहरे बल्कल बसन यह लागति नीकी बाल । कहा न भूषन होइ जो रूप लिख्यो विधि भाल ॥" -शकुन्तला नाटक (२०) १ राजा लचमणसिंहकृत शकुन्तला नाटक से उत ये पंक्तियाँ "अभि- ज्ञानशाकुन्तल' के निम्नोल्लिखित श्लोक का पद्यानुवाद हैं :--- . 'सरसिजमनुविद्ध' शैवलेनापि रम्य मलिनमपि हिमांशोलचम ..लघमी तनोति । ., इयमधिकमनीज्ञा. वल्कलेनापि तन्वी .......... किमिव हि मधुराणां मएडन नाकृतीनाम् ।। अभिज्ञानशाकुन्तल (१।१६)