पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/४७

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काव्य की प्रात्मा-विभिन्न सम्प्रदायः । का अभिव्यञ्जनावाद से तादात्म्य करना ठीक नहीं हैं।' ___ वक्रोक्तिकार ने यद्यपि अपनी परिभाषा को व्यापक बनाया है तथापि उनका झुकाव अलङ्कारों को ही मुख्यता देने की ओर दिखाई देता है, पुस्तक में अलङ्कार शब्द अवश्य व्यापक अर्थ में आया है। रस को भी कुन्तल ने वक्रोक्ति के साधक के रूप में स्वीकार करते हुए दण्डी आदि की भाँति रसवत् अलङ्कार के अन्तर्गत रखा है, फिर भी कुन्तल ने रस की मुख्यता स्वीकार की है । जादू वही है जो सर पर चढ़कर बोले । देखिए :-- 'निरन्तररसोद्गारगर्भसौन्दर्य निर्भराः । . गिरः कवीनां जीवन्ति न कथामात्रमाश्रिताः॥' __-वक्रोक्तिजीवित (उन्मेष ४) कुन्तल ने काव्य में कथा को मुख्यता न देकर रस को ही मुख्यता दी है। उसी के कारण कवियों की वाणी जीवित रहती है। चमत्कार-वैचित्र्य और अलङ्कार सब में ही यह प्रश्न रहता है कि ये हैं किसलिए ? उत्तर यही होता है-सहृदयों की प्रसन्नता के अर्थ । ____३. रीति-सम्प्रदाय :-~-वामन ने रीति को काव्य की आत्मा माना है.-'रीति. रास्मा काव्यस्य' (काव्यालङ्कार सूत्र, १।२६)-और 'विशिष्ट पद-रचना' को रीति कहा है-'विशिष्टपदरचना रीति:' (काव्यालङ्कार सूत्र, १।२७)। यह विशष्टता गुणों में है और काव्य-शोभा के उत्पन्न करने वाले धर्मों को गुण कहा गया है---'काव्य शोभायाः कर्त्तारो धर्मागुणाः' (काव्यालङ्कार सूत्र, ३११११) । गुण और रीति दोनों ही अन्त में साध्य नहीं रहते वरन् शोभा के साधक बन जाते हैं । वामन ने अलङ्कारों के कारण काव्य की ग्राहकता बतलाई है- 'काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात्' (काव्यालङ्कार सूत्र, ११)-किन्तु उन्होंने अलङ्कार को सौन्दर्य के व्यापक अर्थ में माना है.--'सौन्दर्यमलङ्कारः (काव्यालङ्कार सून, ११॥२)। रीति का सम्बन्ध गुणों से है और गुणों का सम्बन्ध काव्य की आत्मा रस से है । माधुर्य और प्रसाद गुणों का सम्बन्ध कोमल और कठोर वर्ण (टवर्ग के वर्ण; तीसरे-चौथे वर्णों के मीलित रूप-जैसे क्रुद्ध, युद्ध, बग्घी, द्वित्तवर्ण) से लगाया जाता है किन्तु ये वर्ण गुणों से घोतित मानसिक स्थिति- विशेष के अनुकूल होते हैं। जैसे हृष्ट-पुष्ट शरीर में ही वीरता के भाव शोभा देते हैं ( यह नहीं कि सब हृष्ट-पुष्ट' वीर होते हैं ) वैसे ही गुण मानसिक दशा १ इस सम्बन्ध में इसी पुस्तक का 'अभिव्यञ्जनावाद एवं कलावाद' शीर्षक अध्याय पदिए।