पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/४८

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सिद्धान्त और अध्ययन के ही द्योतक होते हैं-माधुर्य में चित्त की द्रुति का पिघलना या नीचे की ओर झुकना होता है, अोज में अग्नि की भाँति ऊँचे उठने की गनोदशा होती है और प्रसाद में चारों ओर फैलने या विस्तार की ओर शुकाव रहता है।' ___वामन ने भी रसों को माना है किन्तु दण्डी श्रादि की भाँति रसवत् पालकार के अन्तर्गत नहीं वरन् कान्ति गुण के सम्बन्ध में उनका उल्लेख किया है.... 'दोतरसत्वं कान्तिः ' (काव्यालङ्कारसूत्र, ३।२।१४)----रस' के प्रभाव से वामन भी नहीं बचे हैं। ४. ध्वनि-सम्प्रदाय :-ध्वनि-सम्प्रदाय के प्राचार्य ध्वनिकार' माने गये है और उनकी व्याख्या करने वाले आनन्दवर्धन (नवीं शताब्दी) को भी उतना ही महत्त्व दिया गया है, यहाँ तक कि कुछ लोग दोनों को एक ही मानते है । प्रोफेसर ए० शंकरन ने अपनी पुस्तक 'Some aspects of literatury criticism in Sanskrit' में इसी पक्ष का समर्थन किया है । ध्वनिकार के पूर्व भी ध्वनि-सम्प्रदाय के सिद्धान्त स्वीकृत थे और वहीं उनका विरोध भी हुआ है, ऐसा ध्वनिकार ने ही कहा है :--- 'काव्यस्यारमा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्वः । तस्याभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमन्ये ॥' --चन्यालोक (111) अर्थात् काव्य की आत्मा को पूर्व के आचार्यों ने ध्वनि याहा है । किसी ने उसका अभाव बतलाया है, उसका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया है और किसी ने इसे लक्षणा (गुणवृत्ति) के अन्तर्भुवत रक्खा है। ध्वनि क्या है ? अभिधा और लक्षणा के अतिरिक्त व्यञ्जना नाम की एक तीसरी शब्द-शक्ति मानी गई है, 'व्यञ्जना' शब्द 'वि' पूर्वक 'अञ्ज' (प्रकाशने) से 'ल्युट' प्रत्यय लगाकर बना है, इसका अर्थ है--विशेष रूप में प्रकाशन करने वाली वृत्ति । 'अञ्जन' में भी यही धातु है । व्यञ्जना को हम मालङ्कारिक भाषा में एक विशेष रूप से प्रभावशाली अञ्जन कह सकते है जिसके कारण एक नया अर्थ प्रकाशित होने लगता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी अजन की महत्ता स्वीकार की है :- 'यथा सुअरन्जन आँजि दृग, साधक, सिद्ध, सुजान । कौतुक देखहिं सैल चन, भूतल, भूरि निधान ।' -रामचरितमानस (बालकागड) १ गुण और रीति के इस सम्बन्ध में पुस्तक का शैली के शास्त्रीय आधार' शीष क अध्याय भी पदिए ।