पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/५

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प्रस्तावना ( काव्यशास्त्र का संक्षिप्त इतिहास ) जिस प्रकार भाषा के पश्चात् व्याकरण का उदय होता है उसी प्रकार वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, रघुवंश आदि लक्ष्य ग्रन्थों के पश्चात् . साहित्य या काव्यशास्त्र के लक्षणग्रन्थों का आविर्भाव साहित्यशास्त्र हुआ । साहित्यशास्त्र के विधिवत् ग्रन्थों के पूर्व उनके मूल .: . की तत्त्वों का उल्लेख बीजरूप से मनीषियों, कवियों और श्राधार-शिलाएँ दार्शनिकों की वाणी में हुआ। भाषा का साहित्य से घनिष्ट सम्बन्ध रहा है और वैदिक साहित्य की धार्मिक महत्ता के कारण भाषा का विवेचन, शिक्षा, निरुक्तशास्त्र, व्याकरण, छन्द आदि वेदाङ्गों में तथा न्याय, मीमांसा आदि दर्शनों में होने लगा था। उसी प्रकार के विवेचनों में क्रमशः साहित्यशास्त्र की नींव पड़ी होगी। वैदिक साहित्य :--- 'रस' शब्द का तो उल्लेख वैदिक साहित्य में भी हुअा है, सोमरस के अर्थ में-- 'दधानः कलशे रसम्' (ऋग्वेद, ६१६३११३)-.. और आनन्द के अर्थ में भी - 'रसो सः' (तैत्तिरेय उपनिषद, ११७१)। 'रस' शब्द ही नहीं वैदिक साहित्य में 'उपमा' शब्द का भी प्रयोग हुआ है ---- 'ईयुषी रागमुपमा शाश्वतीनाम्' (ऋग्वेद, ११११३४१५), 'तदप्युमास्ति' (शतपथ ब्राह्मण, १२।११।५)। निरुक्तकार यास्काचार्य ने अपने एक पूर्ववर्ती प्राचार्य गार्य की दी उपमा की परिभाषा उद्धृत की है - 'अथात् उपमा यद्तत् तरसदृशमिति गायः' । इसके अतिरिक्त उन्होंने कई प्रकार की उपमानों का उल्लेख किया है , जैसे कर्मोपमा --- 'यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र सजति' (निरुक्त, ७८८) । पाणिनि की अष्टाध्यायी ( २।११५५,५६) में उपमान, उपमेय' आदि उपमा के अङ्गों का उल्लेख है । वैदिक साहित्य में रसादि का उल्लेख तो अवश्य है किन्तु साहित्यिक सम्प्रदाय के रूप में इसकी रूपरेखा निश्चित करने का सर्वप्रथम श्रेय नाटयशास्त्र के कर्ता भरतमुनि को ही दिया जाता है। राजशेखर के मत से नन्दिकेश्वर ने ब्रह्माजी से उपदेश प्राप्त कर रससिद्धान्त का निरूपण किया था किन्तु उनके मत का अन्यत्र कहीं अता-पता नहीं मिलता। वाल्मीकीय रामायण :---भरतमुनि से पूर्व भी वाल्मीकीय रामायण