पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/५१

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काध्य की प्रात्मा-समन्वय के आचार्यगण देव, मतिराम, कुलपति मिश्र आदि रस-सम्प्रदाय से ही प्रभावित हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ' में भी रस को ही प्रधानता दी गई है। काव्य के लिए भाव और अभिव्यक्ति दोनों ही अपेक्षित हैं। अलङ्कार, वक्रोक्ति, रीति और ध्वनि भी अभिव्यक्ति के सौन्दर्य से अधिक सम्बन्धित है। अलङ्कार शोभा को बढ़ाते हैं, रीति शोभा का अङ्ग है समन्वय किन्तु पूर्ण शोभा नहीं । वक्रोक्ति में काव्य' को साधारण वाणी से पृथक् करने वाली विलक्षणता पर अधिक बल दिया गया है किन्तु स्वाभाविकता और सरलता की उपेक्षा की गई है। कुन्तल ते स्वभावोक्ति को अलङ्कार नहीं माना है । 'मैया कबहिं बढ़ेगी चोटी' अथवा 'मैया मोहि दाज बहुत खिजावत' की स्वाभाविकता पर सौ-सौ अलङ्कार न्यौछावर किये जा सकते हैं। ___ध्वनि और रस-सम्प्रदाय की प्रतिद्वन्द्विता अवश्य है किन्तु उनकी प्रतिद्वन्द्विता इतनी बढ़ी हुई नहीं है कि समन्वय न हो सके। प्राचार्यों ने स्वयं ही उसका समन्वय कर लिया है। ध्वनि का विभाजन करते हुए तीन प्रकार की ध्वनियाँ मानी गई हैं-वस्तुध्वनि, अलङ्कारध्वनि और रसध्वनि । इन तीनों भेदों में रसध्वनि को जो असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनि के अन्तर्गत है अधिक महत्त्व दिया गया है । रस में ध्वनि की तात्कालिक सिद्धि है। उसमें व्यङ्गयार्थ ध्वनित होने की गति इतनी तीव्र होती है कि हनुमानजी की पूंछ की आग और लङ्का-दहन की भाँति पूर्वापर का क्रम दिखाई ही नहीं देता है । रसध्वनि को विशिष्टता देना रस-सिद्धान्त की स्वीकृति है। ध्वनिकार ने कहा है कि व्यङ्गय-व्यञ्जक-भाव के विविध रूप हो सकते हैं किन्तु उनमें जो ररामय रूप है उस एक-मात्र रूप में कवि को अवधानवान् होना चाहिए अर्थात् सावधानी के साथ प्रयत्नशील होना वाञ्छनीय है :- 'व्यंग्यव्यञ्जकभावेऽस्मिन्चिविधे सम्भवत्यपि । रसादिमय एकस्मिन्कविः स्यादवधानवान् ।' .. -ध्वन्यालोक (४५) ____ध्वनिकार ने और भी कहा है कि जैसे वसन्त में वृक्ष नये और हरे-भरे दिखलाई देते हैं वैसे ही रस का प्राश्रय ले लेने से पहले देखे हुए अर्थ भी नया रूप धारण कर लेते हैं :---.. दष्टपूर्वा अपि अर्थाः काव्ये रसपरिग्रहात् ।। सधै नवा इवाभान्ति मधुमास इव न मा० ॥': --ध्वन्यालोक (४)