पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/५२

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सिद्धान्त और अध्ययन ... मम्मटाचार्य ने भी जिन्होंने कि ध्वनि के सिद्धान्त को मानकर रस का वर्णन ध्वनि के अन्तर्गत किया है, कवि की भारती की वन्दना गारते हुए उसे 'ह्लादैकमयीं' और 'नवरसरुचिरा' कहा है। इतना ही नहीं उन्होंने तो दोष, गुण और अलङ्कारों की परिभाषा भी रस का ही प्राश्रय लेकर दी है। जिस प्रकार आत्मा के शौर्यादि गुण हैं उसी प्रकार काव्य के अङ्गी ररा में हमेशा रहने वाले धर्म गुण कहलाते हैं :--- 'ये रसस्याङ्गिनोधर्माः शौर्यादय इवात्मनः । उत्कर्षहेतवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणाः ॥' ____-काव्यप्रकाश (१६६) मम्मटाचार्य ने अलङ्कारों को रस का उपकारी माना है और दोषों की व्याख्या भी रस के सम्बन्ध में की है । उन्होंने कहा है कि दोष' मुख्यार्थ के नाश करने वाले हैं और मुख्य तो रस ही है, उसी के सम्बन्ध से वाच्यार्थ भी मुख्य कहलाता है । उसी के अपकर्ष के कारण दोष कहलाते हैं अर्थात् रस के अपकर्ष के कारण ये दोष की संज्ञा में आते हैं :- 'मुख्यार्थहतिर्दोषो रसश्च मुख्यस्तदानयाद्वाच्यः ।' काव्यप्रकाश (४६) इसमें 'हतिः' शब्द पाया है । 'हति:' का अर्थ है अपकर्ष (इतिरपकर्षः')। इन परिभाषाओं में रस की इतनी स्पष्ट स्वीकृति है कि इनको पढ़कर कोई भी यह नहीं कह सकता कि मम्मट रसवादी नहीं थे, यहाँ तक कि रस- सिद्धान्त के पोषक और अभिभावक आचार्य विश्वनाथ ने इनका ही अनुकरण किया है। उन्होंने गुण शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है :--- 'खल्बङ्गित्वमानस्यात्मन उस्कर्षहेतुत्वाच्छौर्यादयो गुणशब्दवाच्या ।' . -साहित्यदर्पण (11 की वृत्ति) मम्मट ने यद्यपि काव्य की परिभाषा में रस का उल्लेख नहीं किया है (उसमें ध्वनि का भी उल्लेख नहीं है) तथापि जिन तीन चीजों का अर्थात दोष ('दोषी'), गुण ('सगुणौ') और अलङ्कार ('मनलडाकृती पुनः क्यापि') का उल्लेख है, उन सब को रस के आश्रित कर दिया है। रसवादी विश्वनाथ ने यद्यपि मम्मट की काव्य-परिभाषा का खण्डन किया है और रस की स्वतन्त्र व्याख्या की है फिर भी रस को व्यङ्गय ही माना है और ध्वनि के भेदों में असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनि को मानते हुए रस तथा भावों को उनके अन्तर्गत रक्खा है किन्तु रसों की व्याख्या वहाँ पर नहीं की है। भेद इतना ही है कि मम्मट ने रस का वर्णन स्वतन्त्र न रखकर उसे ध्वनि यो ही .