पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/५७

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काव्य की परिभाषा--काव्य के तस्व १४ प्रकाश में ध्वनि को प्रधानता दी गई है, रस को भी ध्वनि के अन्तर्गत माना. गया है किन्तु इस परिभाषा में न ध्वनि का ही नाम है और न रस का कोई उल्लेख है। यह परिभाषा ऊपरी है। मम्मटाचार्य ने यद्यपि रस का उल्लेख नहीं किया है तथापि गुण और दोषों को, जिनको कि परिभाषा में प्रधानता मिली है, रस के ही उत्कर्ष और अपकर्ष का (घटाने का) हेतु माना है। उन्होंने रस को ही अङ्गी माना है :- _ 'ये रसस्याङ्गिनोधर्माः शौर्यादय इवारमनः । उत्कर्ष हेतवस्ते स्युरचलस्तियो. गुणाः ॥' -काव्यप्रकाश (८।६६) । अर्थात् जिस तरह से शौर्यादि प्रात्मा के गुण है, उसी प्रकार काव्य में अङ्गीरूप रस के स्थायी धर्म गुण हैं और वे रस के उत्कर्ष के कारण होते हैं। इस प्रकार मम्मट ने भी कुछ फेर-फार के साथ रस को ही प्रधानता दी है। श्राचार्य विश्वनाथ : प्राचार्य विश्वनाथ ने 'एके साधे सब सधे के नियम का अनुकरण करते हुए काव्य की परिभाषा इस प्रकार की है--'वाक्यं रसास्मर्क काव्यम्' अर्थात् रसयुक्त वाक्य काव्य है। जहाँ दण्डी, मम्मटादि ने पत्तों और शाखाओं को सोचने की ओर तुलसीदासजी के शब्दों में 'बरी-बरी में लौन' देने की कोशिश की है वहाँ विश्वनाथ ने जड़ को सींचा है। गुण, अलङ्कारादि सभी रस के पोषक हैं। 'वाक्य' शब्द में अर्थ भी शामिल हो जाता है क्योंकि सार्थक शब्द ही वाक्य बन सकता है । इसके 'रसात्मक' शब्द में काव्य का अनुभूतिपक्ष या भावपक्ष आगया. और 'वाक्य' शब्द में अभिव्यक्तिपक्ष अथवा कलापक्ष आगया । इस परिभाषा में केवल यह दोष बतलाया जाता है कि रस की परिभाषा अपेक्षित रहती है किन्तु मोटे तौर से सब लोग जानते हैं कि रस क्या चीज है, वैसे तो गुण और दोष शब्द भी व्याख्या की अपेक्षा रखते हैं। __पंडितराज जगन्नाथ : रसगंगाधरकार पंडितराज जगन्नाथ (१७ वी शताब्दी) ने रमणीय अर्थ को प्रधानता दी है। उनका कथन है कि रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द काव्य है:- 'रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्' -रसगंगाधर (काव्यमाला, पृष्ठ ४) 'रमणीय' का अर्थ है मन को रमाने या लीन कर लेने वाला । रस में भी मन मानन्द से. व्याप्त हो जाता है । रमणीयता में रस का भाव संलग्न है। रमणीय अर्थ में रस के अतिरिक्त और चमत्कार भी आजाते हैं। पंडितराज जगन्नाथ ने रमणीय का अर्थ चमत्कारपूर्ण आह्लाद बतलाया है। रम की