पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६

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(प्रो० जेकोबी ने इसे छटी शती ईसा पूर्व का माना है ) में पाठ रसों का उल्लेख हुआ है-'रखैः शङ्गारकरुणहास्यरौदभयानकैः . . . . . (बालकाण्ड, २१६)-किन्तु कुछ विद्वान् वाल्मीकीय रामायण के प्रारम्भिक सर्गो को प्रक्षिप्त मानते हैं । सम्भव है कि वे प्रामाणिक न हों किन्तु क्रौञ्चबध से उत्थित शोक में उसके उदय होने की बात बहुत प्राचीन काल से चली आती है। उसका उल्लेख कालिदास के 'रघुवंश' १, भवभूति के 'उत्तररामचरित' २, ध्वनिकार के 'ध्वन्यालोक' 3 आदि ग्रन्थों में भी है । यदि वाल्मीकीय रामायण की 'शोकः श्लोकत्वमागतः' (बालकाण्ड, २।४०) की बात ठीक है तो हमारे आदिकाव्य का उदय ही करुणरस में हुआ । ___ वाल्मीकीय रामायण की बात को संदिग्ध होने के कारण चाहे छोड़ दें किन्तु उससे रस-परम्परा की प्राचीनता में अन्तर नहीं पड़ता। स्वयं भरतमुनि ने अपने पूर्व के प्राचार्यों की ओर संकेत किया है.--'ऐते ह्यष्टौ रसः प्रोक्ता द्रुहिणेन महात्मना' (नाव्यशास्त्र, ६।१६)-इसमें त्रुहिण नाम के किसी पूर्व के प्राचार्य की ओर संकेत हुआ है। इस परम्परा का भी उल्लेख 'अथानु- वश्ये प्रार्य भवतः' अथवा 'श्लोकौ भवतः' लिखकर हुआ है। भरतमुनि और रस :--भरतमुनि ने इन रसों का विवेचन रूपकों या नाटकों के ही सम्बन्ध में किया था क्योंकि उस समय काव्य अधिकांश में नाटकों तक ही सीमित था । 'नाट्यशास्त्र' के प्रसिद्ध टीकाकार 'अभिनवभारती' के _ _ १. 'निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोका' -रघुवंश (१४।२५) २. 'अथ स ब्रह्मर्षिरेकदा माध्यन्दिनसवनाय नदी तमसामनुप्रपन्नः । तन्त्र युग्मचारिणाः क्रौञ्चयोरेक व्याधेन विध्यमानं ददर्श । आकस्मिक प्रत्यवभासां च देवीं वाचमन्यतमानुष्टभेन छन्दसा परिणतामभ्य दैरयत् ।' -उत्तररामचरित (२१४ के पश्चात् गद्य) अर्थात् एक बार वे वाल्मीकि ऋषि मध्याह्न में स्नान के लिए तमसा नदी के किनारे पहुँचे । वहाँ क्रौच के जोड़े में से एक को बहेलिए द्वारा तीर से बेधे जाते हुए देख अकस्मात वाणी देवी अनुष्टुम छन्द ('मा निषाद प्रतिष्ठा ........') में परिणत होगई । ३. 'काव्यस्यात्मा स एवार्थस्तथा चादिकवेः पुरा । क्रौञ्चद्वन्द्व वियोगोत्थः शोकः श्लोकत्वमागतः ॥' -~-वन्यालोक ( ११५)