पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६१

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काव्य की परिभाषा-चमत्कारवाद २३ के नाना रूपों और व्यापारों को अपने योग-क्षेम, हानि-लाभ, सुख-दुःख श्रादि से सम्बद्ध करके देखता रहता है तब तक उसका हृदय एक प्रकार से बाद रहता है । इन रूपों और व्यापारों के सामने जब-कभी वह अपनी पृथक् सत्ता की धारणा से छूटकर---अपने आपको बिल्कुल भूलकर-विशुद्ध अनुभूति- मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त-हृदय हो जाता है ।' -चिन्तामणि (भाग १, पष्ठ १६२) - इस मुक्तावस्था में पहुँचने से व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसके सम्बन्ध में प्राचार्य शुक्लजी लिखते हैं :- 'कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकचित मण्डल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भावभूमि पर ले जाती है...इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता। वह अपनी सत्ता को लोकसत्ता में लीन किये रहता है।...' 'इस अनुभूतियोग के अभ्यास से हमारे मनोविकारों का परिकार तथा शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है।' -चिन्तामणि ( भाग १, पृष्ठ १६३) शुक्लजी भाव-जगत और वाह्य जगत का सामञ्जस्य चाहते हैं, इसलिए वे न तो कोरे चमत्कारवाद के पक्ष में हैं और न मनोरञ्जन के। वे काव्य को लोकहित से समन्वित करते हैं। प्राचार्य द्विवेदीजी ने चमत्कारवाद' चमत्कारवाद को कुछ अधिक आश्रय दिया है। चमत्कार ... के समर्थन में वे क्षेमेन्द्र का मत देते हुए कहते हैं :- ... 'शिक्षित कवि की उक्तियों में चमत्कार का होना परमावश्यक है। यदि कविता में चमत्कार नहीं-विलक्षणता नहीं-तो उससे अानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती । क्षेमेन्द्र की राय है-'न हि चमत्कारविरहितस्य कवेः कवित्वं, काव्यस्य वा काव्यत्वम् ।' -रसज्ञ-रञ्जन (पृष्ठ २६). द्विवेदीजी ने श्रीकण्ठचरित के कर्ता का उद्धरण देते हुए रस को भी परमावश्यक माना है । उद्धरण इस प्रकार है :-- 'तैस्तैरलं कृतिशतैरवतंसितोऽपि रूढ़ो महत्यपि पदे धतसौष्ठवोऽपि । नूनं बिना धनरसप्रसराभिषेक काव्याधिराजपदमह ति न प्रयन्धः।' -श्रीकण्ठचरित ( २ । ३२)