पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६२

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सिद्धान्त और अध्ययन २४ अर्थात् सैकड़ों अलङ्कारों से अलंकृत उच्चासन पर आरूढ़ होकर भी और सब प्रकार का सौष्टव धारण करके भी रस-धारा के अभिषेक के बिना कोई प्रबन्ध काव्याधिराज को पदवी को नहीं प्राप्त होता । ____ प्राचार्य शुक्लजी ने इस सम्बन्ध में अपना मत स्पष्ट रखा है। उन्होंने कोरे चमत्कारवाद को नहीं स्वीकार किया है, वे उसी चमत्कार के पक्ष में हैं जो भाव-प्रेरित हो । वे लिखते हैं :- ___....किसी उक्ति की तह में उसके प्रवर्तक के रूप में यदि कोई भाव या मार्मिक अन्तवृत्ति छिपी है तो चाहे वैचित्र्य हो, या न हो काव्य की सरसता बराबर पाई जायगी ।.... 'ऐसी उक्ति जिसे सुनते ही मन किसी भाव या मार्मिक भावना ( जैसे प्रस्तुत वस्तु का सौन्दर्य श्रादि ) में लीन न होकर एकबारगी कथन के अन ढंग, वर्ण-विन्यास या पद-प्रयोग की विशेषता, तूर की सूझ, कवि की चातुरी, या निपुणता इत्यादि का विचार करने लगे, वह काव्य नहीं, सूक्ति है।' चिन्तामणि ( भाग १, पृष्ठ २३३ ) शुक्लजी ने केवल चमत्कार को सूक्ति कहा है। यदि चमत्कार शब्द को व्यापक रूप में मान लिया जाय और हम भाव के चमत्कार को भी चमत्कार कहें तो क्षेमेन्द्र के कथन की भी सार्थकता हो सकती है। जिन उदाहरणों, जैसे मण्डन के सर्वये---'चिरजीवहु नन्द को मारी भरी, गहि बाँह गरीब ने ठाड़ी करी'-~में भाव की स्वाभाविकता की अपेक्षा दूर की सूझ ही अधिक है, हम इसे चमत्कार ही कहेंगे किन्तु यह भावशून्य नहीं है। केशव-को-सी उक्ति 'बेर भयानक सी श्रति लगे । अर्क समह जहाँ जगमगे' ( रामचन्द्रिका, अरण्यकाण्ड ) में हमें शुल्कजी के साथ यह कहना पड़ेगा कि इसमें कोरी सूक्ति ही है, कवित्व नहीं । प्रसाद : प्रसादजो अपने 'काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध' शीर्षक निबन्ध-संग्रह में काव्य को आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति बतलाते हैं। उनका कथन इस प्रकार है :- 'काव्य प्रास्मा की सङ्कल्पात्मक अनुभूति है, जिसका सम्बन्ध विश्लेषण, विकल्प या विज्ञान से नहीं है। वह श्रेयमयी प्रेथ रचनात्मक ज्ञान-धारा है।... 'श्रात्मा की मनन-शक्ति की वह असाधारण अवस्था जी श्रेय सस्य को उसके मूल चारुत्व में सहसा ग्रहण कर लेती है, काग्य में सकल्पात्मक मूल अनुभूति कही जा सकती है। -काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध ( काव्य और कला, पृष्ठ ३८)