पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६६

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सिद्धान्त और अध्ययन की माला बनाना आदि बातें परिगणित हैं। उनमें पद्य-रचना या समस्यापूति भी है । काव्य जिसमें गद्य और पद्य दोनों ही पाते हैं, नहीं है । दशकगार धनञ्जय ( ११ वीं शताब्दी ) ने धीरललित नायक को कलात्मा गाना है-'निश्चिन्तो धीरललितः कलासक्तः सुखी मृदुः' ( दशरूपक, २१३)... टीका में उसे 'गीतादिकलाविशिष्टो' ( दशरूपक, २।३ कारिका की टीका ) कहा है । दुष्यन्त ऐसा ही नायक था। उसने शकुन्तला का ऐसा चिज बनाया था कि उसमें 'भित्तौ समयामपि' अर्थात् तसवीर का धरातल एक-सा होता हुआ भी त्रिवली का उठाव-गिराव और नाभि की गहराई का छायालोक द्वारा स्पष्ट भान होता था :- 'अस्यस्तुगामिव स्तनद्वयमिदं निम्नेव नाभिस्थितिः । दृश्यन्ते विषमोन्नताश्च वलयो भित्तो समयामपि ॥' .-शभिज्ञान शाकुन्तल अब यह प्रश्न होता है कि क्या वास्तव में काव्य और कलाओं में ऐसा पार्थक्य है कि वे एक दूसरे से स्वतन्त्र मानी जायें ? वैसे तो उनमें थोड़ा-बहुत भेद है ही । कलात्रों में क्रिया के कौशल का भाव अधिक है, उसकी एक परि.. भाषा में कला को कर्तृत्व का व्यञ्जक माना गया है.---'व्याजयति क शक्ति कले ति तेनेह कथिता सा' (प्रसादजी द्वारा भोजराज के तरथप्रकाश से उद्धृत- काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध, पृष्ठ ५३)----किन्तु इन दोनों के बहुत-से सम्बन्ध-सूत्र हैं जो काव्य को यद्यपि कलात्रों के अन्तर्गत नहीं मानते तथापि उसको कला का सगोत्री अवश्य बना देते हैं। काव्यों में नाटक या एका विशिष्ट स्थान है.-'काव्येषु नाटक रम्यम्' । उसमें गीत-वाद्य, चित्रकारी इत्यादि सभी कलाएँ आजाती हैं । भरत मुनि ने नाटक के सम्बन्ध में कहा है ... 'लोकोपदेशजननं नाट्यमेत नविष्यति । न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ॥' - नाथशास्त्र (१1११३) 'न स योगी न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ -नायशास्त्र (11११४) काव्य के सम्बन्ध में भी एक ऐसी ही उक्ति है। वैसे भी तो सङ्गीत का विशेष-विशेष स्वरों द्वारा रसों से सीधा सम्बन्ध माना गया है। सातवीं शताब्दि के लिखे हुए 'विष्णुधर्मोत्तर' में स्वरों और रसों का सम्बन्ध इस प्रकार दिया गया है :-- ... 'पूर्वोक्ताश्च नवरसाः । तत्र हास्यशृङ्गारयोमध्यम्-पंचमी । धीरोदा-