पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६७

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काव्य और कला दृष्टिकोणभेद २६ न तेषु षडजपंचमौ । करुणे निषादगान्धारौ । वीभत्सभयानकयो- धैवतम् ॥ -('आधुनिक हिन्दी साहित्य' में संग्रहीत राय कृष्णदास के 'कलाकी ____ भारतीय परिभाषा' शीर्षक लेख के उद्धृत, पृष्ठ २ ) इस ग्रन्थ में काव्य और कलाओं का एक ही दृष्टिकोण से वर्णन हुआ है। यह बात में श्रीब्रजरत्नदास की गवाही पर लिख रहा हूँ, काव्य की भांति चित्रों का भी सम्बन्ध रसों से स्थापित किया गया है। मैंने स्वयं इस ग्रन्थ को मूल में नहीं देखा है । इसके बारे में अन्यत्र भी सुना है । डाक्टर स्टेला. क्रेमरिश ( Dr. Stella Kramrisch ) द्वारा किया हुआ इसका अंग्रेजी अनुवाद भी निकाला गया है, उससे ही चित्रकला में रसों के सम्बन्ध में नीचे का उद्धरण दिया जाता है :- ___ 'Markandeya said : The sentiments ( Rasas ) repre: sented in painting are said to be nine......Picture to embellish homes shoned belong to---Sringar, Hasya and Shant rases.'


Vishnu Dharmottar (Part 2, Page 60).

___'अर्थात् मार्कण्डेय ने कहा : चित्रों में अङ्कित होने वाले रस नौ हैं।..." जो चित्र घरों के अलङ्करण के लिए हों वे शृङ्गार, हास्य और शान्तरस के होने चाहिएं ।' कला के दोषों के उदाहरणों में रस के ही दोषों को बतलाकर दण्डी ने भी कला और काव्य के सम्बन्ध की एक अव्यक्त स्वीकृति दी है (यद्यपि इसमें कला और काव्य का पार्थक्य भी व्यजित है) कि काव्य को कलाओं के वर्णन में उनके नियम के विरुद्ध न जाना चाहिए :- 'मार्गः कलाविरोधस्य मनागुद्दिश्यते यथा ॥ . वीरङ्गारयोर्भावौ स्थायिनो क्रोधविस्मयो । पूर्ण सप्तस्वरः सोऽयं भिन्नमार्गः प्रवर्तते ॥ -काव्यादर्श (३११७०). . अर्थात् कला-विरोध का उदाहरण दिखाते हैं, जैसे वीर और शृङ्गार के स्थायीभाव क्रोध और विस्मय हैं (यह दोष का उदाहरण हुआ क्योंकि वास्तव में वीर का स्थायीभाव उत्साह और शृङ्गार का रति है) और पूर्ण सातों स्वर मिलकर गायन होता हैं (यह बात भी कला-सिद्धान्त के विरुद्धः है इसमें से बेमेल स्वरों को निकाल देना चाहिए था)