पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/७

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कर्ता अभिनवगुप्ताचार्य ने इस बात को स्वीकार किया है - 'काव्य तावन्द- शरूपकात्मकमेव'- फिर भी भरतमुनि की व्याख्या इतनी विशद थी कि पीछे के आचार्य भी उनके मुखापेक्षी रहे हैं। आज तक उनका मान है। यद्यपि भरतमुनि का प्राविर्भावकाल निश्चित नहीं है तथापि ये ईसा पूर्व पहली शताब्दी के निकटवर्ती रहे होंगे । कालिदास ने अपने विक्रमोर्वशी' नाटक में भरतमुनि का उल्लेख किया है.---'मुनिना भरतेन या प्रयोगो भवतीप्यष्टरसा- श्रयो नियुक्तः' (विक्रमोर्वशी, २११७)-इसलिए तथा अन्य कारणों से विद्वान् लोग भरतमुनि का समय ईसा की पहली शताब्दी के पूर्व ही मानते हैं । .. नाटक जनसमुदाय की वस्तु थी। इसमें श्रवणसुख' के साथ नेत्रसुख भी मिलता था और मनोरञ्जन के साथ-साथ बिना अधिक प्रयास के जीवन के तथ्य भी हाथ लग जाते थे। कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्र' में प्राचार्य गणदास से कहलाया है :- ' त्रैगुण्योद्भवमन्त्र लोकचरितं नानारसं दृश्यते नाट्य भिन्न रुचेर्जनस्य बहुधाप्येक समाराधकम् ॥' - मालविकाग्निमित्र ( ११४) अर्थात् सत, रज, तम तीनों गुणों से उत्पन्न सब प्रकार के रसों से लोक चरित दिखाये जाते हैं इसलिए नाटक भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले लोगों के मनोरञ्जन का एक मात्र साधन है। उपर्युक्त कारणों से उसे (नाटयशास्त्र को ) सब वर्गों के अधिकार का पांचवा वेद कहा है, इसमें शूद्रों अर्थात् अल्प बुद्धिवालों की भी गति समझी गई है । शूद्रों का अधिकार वेद में नहीं था :-- न वेदव्यवहारोऽयं संश्राव्यः शूद्रजातिपु । तस्मात् सजापरं वेदं पञ्चमं सावर्णिकम् ॥' -नाट्यशास्त्र (१।१२) भरतमुनि की काव्य की परिभाषा में जो विशेषण आये हैं उनमें रस के साथ नाटक और जनपद के लिए सुबोधता का ही अधिक ध्यान रखा गया है :- 'मृदुललितपदाव्य गूढशब्दार्थ होनं, - जनपदसुख बोध्य युक्तिमन्नृत्ययोज्यम् । बहु कृतरसभार्ग संधिसंधानयुक्तं, . स भवति शुभकाव्यं नाटकप्रक्षकारणाम् ॥१. स भवति शुभकाव्य (१६११२) ... 'नाट्यशास्त्र' की मेरी जो प्रति (हरिदास ग्रन्थमाला की) है उसमें