पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/८१

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४३ साहित्य की मूल प्ररणाएँ-भारतीय दृष्टिकोण प्रत्येक मनुष्य में थोड़े-बहुत अंश में दोनों ही प्रवृत्तियाँ होती हैं । मैं ख्याल करता हूँ कि अन्तर्मुखी लोग यदि कविता करते हैं तो वे व्यक्तित्व-प्रधान प्रगीतकाव्य की ओर अधिक झुकते हैं और बहिर्मुखी जगबीती का वर्णन करते युग मेरी समझ से भारतीय दृष्टिकोण के अधिक निकट आता है । उपनि- षदों में यद्यपि पुत्रैषणा (काम), वित्तषणा (अर्थ) भारतीय दृष्टिकोण और लोकैषणा (यश) को प्रेरक शक्तियों के रूप में माना है तथापि इनको नीचा स्थान दिया है और आत्म-प्रेम को सब क्रियाओं का मूल कारण माना है :- ‘स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। -वृहदारण्यक (२।४।५) पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता वरन् प्रात्मा की कामना से पति प्रिय होता है । इसी प्रकार उन्होंने पुत्र और वित्त के सम्बन्ध में भी कहा है :- ____ 'नवा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवति, श्रात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति। -वृहदारण्यक (२।४।५) इस प्रकार आत्म-प्रेम की श्रेष्ठता दिखाकर ऋषि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मा पर विचार करने का उपदेश दिया था। कामवासना और प्रभुत्व-कामना दोनों ही आत्म-प्रेम के नीचे रूप हैं। दोनों में ही आत्मरक्षा की भावना प्रोत- प्रोत हैं। दोनों ही एक-दूसरे के प्रात्मप्रकाशोन्मुख बदले हुए रूप हैं। हमको न आत्मानों पर प्रभुत्व की आवश्यकता है और न उनको जड़ वस्तुओं की भाँति कामना का विषय बनाना है। हम चाहते हैं सहृदयता और सहानुभूति द्वारा भेद- भाव को तिरोहित कर आत्मा के अखण्ड चिन्मय प्रानन्दमय रूप की स्वानुभूति (Self Realisation)। यही है अपने और पराये से परे 'न ममेति न परस्येति' वाली साधारणीकरण द्वारा प्राप्त काव्य की रसमय अवस्था, जिसको ब्रह्मानन्द- सहोदर का अलौकिक रूप दिया गया है। यही प्रात्मानुभूति आत्मरक्षा का क्रियात्मक रूप धारण करती है। जैसे-जैसे हम भौतिक सत्ता की रक्षा से उठ- कर प्रादर्शों की रक्षा की ओर जाते हैं वैसे ही हमारी आत्मानुभूति बढ़ती है । हमारी सारी क्रियाएँ इसी की भिन्न-भिन्न धाराएँ हैं। जीवन-लालसा तो है ही, मरण-लालसा भी इसी का ही रूप है। मनुष्य किसी वृहत् स्वार्थ के लिए प्रात्मबलिदान करता है और आत्महत्या में भी तभी प्रवृत्त होता है जब वह