पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/८३

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साहित्य की मूल प्ररणाएँ-काव्य के प्रयोजन साहित्य के भिन्न-भिन्न रूप आत्मरक्षा के ही स्वरूप हैं । धर्म हमारी आत्मा की वर्तमान और भावी रक्षा से सम्बन्ध रखता है। उसके द्वारा प्रात्मा का विस्तार भी होता है । इतिहास भूतकाल को हमारे सामने लाकर हमारे पूर्वजों के क्रिया-कलाप को अतीत के गर्त में विलीन होने से बचाता है । विज्ञान अनात्म जड़ पदार्थों को हमारे मन के नियमों से बँधा हुआ दिखाकर और उनके द्वारा हमारे भौतिक सुखों का साधन कर मानव-प्रात्मा का विजय-गान उद्घोषित करता है । काव्य द्वारा सहानुभूति की वृद्धि के कारण आत्मरक्षा विस्तृत रूप में आती है। __साहित्य के प्राचार्यों ने काव्य के भिन्न-भिन्न प्रयोजन माने हैं, उनमें कुछ प्रेरणा-रूप आन्तरिक हैं और कुछ प्रयोजन-रूप वाह्य हैं । पीछे की ओर देखने से प्रयोजन प्रेरणाओं का रूप धारण कर लेते हैं। भविष्य काव्य के प्रयोजन में स्थित प्रेरणाएँ प्रयोजन बनती हैं। कुछ का सम्बन्ध साहित्य-स्रष्टा से है और कुछ का आस्वादक से है किन्तु बहुत अंश में भोक्ता और स्रष्टा के दृष्टिकोण मिल जाते हैं । ___ कुछ प्राचार्यों (जैसे मम्मट) ने तो अानन्द को ही मूल प्रयोजन माना है क्योंकि यह रसास्वाद का फल या पर्याय है और उसमें और सब प्रकार का ज्ञान विलीन हो जाता है :- ___'सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादनसमद तं विगलितवेद्या- न्तरमानन्दम् । -काव्यप्रकाश (११२ की वृत्ति) साहित्यदर्पणकार ने काव्य को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का साधन बतलाकर अपने कयन की पुष्टि में भामह का निम्नोल्लिखित श्लोक उद्धृत किया है :- 'धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च । प्रीति करीति कीर्तिच साधुकाव्यनिषेवणम् ॥' काव्यालङ्कार (१२) कहीं-कहीं 'निबन्धनम्' भी पाठ है किन्तु 'निषेवणम्' स्रष्टा और पाठक दोनों पर लागू हो सकता है । 'कीर्ति' का लाभ तो अधिकतर कवि को ही होता है, 'प्रीति' में पाठक और कवि दोनों का भाग है । इस श्लोक में यह भी देखने की बात है कि काव्य को कला से भिन्न माना है । काव्य द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और कलानों में कुशलता तथा कीत्ति और प्रीति (प्रसन्नता) की प्राप्ति होती है । ये सब प्रायः वाह्य प्रेरक हैं।