पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/८७

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४8 साहित्य की मूल प्रेरणाएँ-काव्य के प्रयोजन pills) की तरह काव्य-कटु उपदेश को भी ग्राह्य बना देता है ।' कविवर बिहारीलाल के निम्नलिखित दोहे ने राजा जयशाह पर जादू-का- सा असर किया, यदि वे लट्ठमार कोरा उपदेश देते तो शायद वे किसी षड़यन्त्र के चक्कर में पड़ कर जान से भी हाथ धो बैठते :- 'नहिं परागु, नहिं मधुर मधु, महिं बिकासु इहि काल । अली, कली ही सौं बंध्यौ, श्रागै कौन हवाल ।' . -बिहारी-रत्नाकर (दोहा ३८) स्वान्तःसुखाय :-तुलसी ने अपने काव्य को 'स्थान्तःसुखाय' कहा है:- 'स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथाभाषानिबन्धमतिमन्जुलमातनोति'- स्वान्तःसुखाय से केवल उनका यही अभिप्राय है कि उनको रामगुण गाने से अलौकिक सन्तोष मिलता था । वे धन और यश के प्रलोभनों से परे थे। वास्तव में सत्काव्य स्वान्तःसुखाय ही लिखा जाता है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह श्रोताओं के लिए नहीं होता । काव्य को कहने और सुनने में सुख मिलता है लेकिन प्रात्माभिव्यक्ति का सुख अभिव्यक्त कर देने मात्र से समाप्त नहीं हो जाता । कवि अरण्यरोदन करना नहीं चाहता, वह अपने समान- धर्मियों तक अपनी बात पहुँचाना चाहता है । भवभूति तो अनन्तकाल तक ठहरने और सारी पृथ्वी में खोजने के लिए तैयार थे। वर्तमान की खोज के लिए सारी पृथ्वी और भविष्य की खोज के लिए अन्नतकाल का उल्लेख किया गया है :- 'उत्पस्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा । कालो ह्ययं निरवधिविपुला च पृथ्वी ।।' -मालतीमाधव (१०८) गोस्वामी तुलसीदासजी यद्यपि स्वान्तःसुखाय लिखते हैं फिर भी उनको बुधजनों के आदर की चिन्ता रहती है :- 'जो प्रबन्ध बुध नहिं पादरहीं । सो सम बादि बाल कवि करहीं।' -रामचरितमानस (बालकाण्ड) साहित्यदर्पण में भी ऐसा ही कहा गया है। उसमें 'गुड' के स्थान में 'सित शर्करा' (मिश्री) प्रयुक्त किया गया है:- 'कटुकोषधोपशमनीयस्य रोगस्य सित्तशर्करोपशमनीयत्वे । कस्य वा रोगिणः सितशर्कराप्रवृत्तिः साधीयसी न स्थात! .. - साहित्यदर्पण (१३२ की वृत्ति)