पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/८८

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सिन्धान्त और अध्ययन कवि अपने को पाठक और श्रोतानों के साथ भाव के एक सूत्र में बाँधने का सुख प्राप्त करता है । साधारणीकरण में भी पाला की सामाजिकता का भाव निहित रहता है । काव्य के प्रयोजनों में यदि सामाजिकता को भी स्थान दिया जाय तो कुछ अनुचित न होगा। पाश्चात्य देशों में प्राय: काव्य को कालाओं के अन्तर्गत गाना है। इस कारण वहाँ काव्य के प्रयोजनों का विवेचन व्यापक रूप से कला के प्रयोजनों के साथ चलता है। इन्हीं को लक्ष्य करने प्रतिभावान पुरुष कला के प्रयोजन काव्यरचना में प्रवृत्त होते हैं। बाला के प्रयोजन बहुत से माने गये हैं किन्तु उनमें नी अधिक प्रख्यात है। वे इरा प्रकार है :- १. कला कला के अर्थ (Art: for Art's sure)। २. कला जीवन के अर्थ (Art for life's sake)। ३. कला जीवन से पलायन के अर्थ (Art as an esciupe from lifc)। ४. कला जीवन में प्रवेश के लिए (Art as an escalpe into life)। ५. कला सेवा के अर्थ (Art for service's saks) | ६. कला प्रात्मानुभूति के अर्थ (Art for self-realization)। ७. कला अानन्द के अर्थ (Art for joy)। ८. कला विनोद के अर्थ (Art for recreation) । ६. कला सृजन की अदम्य आवश्यकता-पूत्ति के अर्थ (Art as creati- ve necessity) ये सब प्रयोजन एक-दूसरे से नितान्त भिन्न नहीं है फिर भी इनमें दृष्टि- कोण की भिन्नता है । इन पर हम अलग-अलग संक्षिप्त रूप से विचार करेंगे। ..... कला कला के अर्थ : इस वाद ने अपने दुरुपयोग में अधिक ख्याति पाई है । कला का प्रयोजन उसकी उपयोगिता में नहीं है और उसका मूल्य आर्थिक था नैतिक मान से निश्चित करना उसके साथ अन्याय करना है । कला से परे और किसी वाह्य वस्तु को उसका प्रयोजन-रूप से नियामक मानना उसके स्वायत्त शासन में अविश्वास है और उसको स्वाधीनता के स्वर्ग से घसीटकर अन्धकारमय गर्त में ढकेलना है । जब दुर्गंधपूर्ण शव-परीक्षा करते हुए आन्तरिक अवयवों की वीभत्सता के प्रसार के लिए यमराज नहीं वरन् गुवराज-सहोदर डाक्टरों को और जब कोयले के रूप में प्रस्तरीभूत कालिगा को भक्षण कर धुएँ के पहाड़ों को वमन करने वाली मिलों के कर्ण-कुहर-भेधी कर्कश नाद के लिए अर्थशास्त्र के पण्डितों को कलाविदों की चटसाल में संवेदनशीलता की