पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/८९

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साहित्य की मूल प्ररणाएँ-कला के प्रयोजन शिक्षा के लिए नहीं भेजा जाता तो बेचारे कलाकार पर नीति और अर्थशास्त्र का अंकुश क्यों-'निरङ्क शाः कवयः' । कला की मनोमुग्धकारिणी सुन्दरता ही उसकी परम उपयोगिता है (यह कलावादियों का पक्ष है, मेरा नहीं है)। ___यह वाद कला-सृजन की अदम्य आवश्यकता (Art as a creative necessity) वाले वाद से मिलता है, अन्तर इतना ही है कि कलावाद में वाह्य प्रयोजन के अभाव के ऊपर जोर दिया जाता है और इसमें प्रान्तरिक प्रेरणा की अदम्यता को महत्त्व प्रदान किया जाता है । प्रसादजी के स्कन्दगुप्त में देवसेना और विजया के संवाद में इन दोनों का सम्मिलित स्वर पाया जाता है । देवसेना सङ्गीतकला की उपासिका है। वह समय-कुसमय गाती रहना चाहती है । इस सम्बन्ध में अर्थ और प्रयोजन की प्रतीक श्रेष्ठि-कन्या विजया आपत्ति उठाती है । उसका समाधान करते हुए देवसेना पूंछती है :- ___'देवसेना--तुमने एकान्त टीले पर, सबसे अलग, शरद के सुन्दर प्रभात में फूला हुश्रा, फूलों से लदा हुश्रा, पारिजात वृक्ष देखा है ? विजया-नहीं तो। देवसेना-उसका स्वर अन्य वृक्षों से नहीं मिलता। घह अकेले अपने सौरभ की तान से दक्षिण-पवन में कम्प उत्पन्न करता है, कलियों को चटका- कर, ताली बजाकर, झूम-झूमकर नाचता है। अपना नृत्य, अपना सङ्गीत, वह स्वयं देखता है-सुनता है। उसके अन्तर में जीवन-शक्ति वीणा बजाती है। वह बड़े कोमल स्वर में गाता हे-' . -स्कन्दगुप्त (द्वितीय श्रक, पृष्ठ ५३ तथा ५४) देवसेना वाला कला का यह रूप भक्ति-पक्ष में गोस्वामीजी का स्वान्तः- सुखाय है । वास्तव में कला कला के अर्थ का शुद्ध स्वरूप भारतीय स्वान्तः- सुखाय ही में मिलता है जो काव्य को अर्थ और यश के वाह्य प्रलोभनों के परे बतलाता है किन्तु विकृत रूप में यह कला का नीति से विच्छेद कर देता है। वास्तव में कला का नीति से विच्छेद करना उसको संकुचित बनाना है । स्व- तन्त्रता का अर्थ दूसरों की अवहेलना नहीं । नीति भी सौन्दर्य का ही आन्तरिक रूप है । व्यापक बनने के लिए आत्मसंकोच आवश्यक हो जाता है। रवि बाबू ने कला को उपयोगिता से परे माना है किन्तु वे उसका मङ्गल के साथ समन्वय करते हैं । आत्ममङ्गल परमङ्गल के साथ अनुस्यूत है और परमङ्गल बिना आत्मसंकोच के सम्भव नहीं। . . २. कला जीवन के अर्थ : कला का उदय जीवन से है, उसका उद्देश्य जीवन की व्याख्या ही नहीं वरन् उसे दिशा भी देना है । वह जीवन में जीवन