पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/९०

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१२ सिद्धान्त और अध्ययन डालती है । वह स्वयं साधन न बनकर एक वृहत्तर उद्देश्य की साधिका होकर अपने को सार्थक बनाती है । वह जीवन को जीवन योग्य बनाकर उसे ऊँचा उठाती है । वह जीवन में नये यादों की स्थापना कर उनका प्रचार करती है और हमारे जीवन की समस्याओं पर नया प्रकाश डालती है, यही कान्ता के सदृश उपदेश देना है। .. कला के इस आदर्श के अनुकूल कला द्वारा शक्तियों का विकास तथा

आत्मगत भावों की तुष्टि और पुष्टि होती है। हमारे पालम्बनों का क्षेत्र

विस्तृत हो जाने से हमारी सहानुभूति बढ़ता है और हमारे जीवन को पूर्णता मिलती है। इस प्रकार कला जीवन की सहचरी बन जाती है। टॉल्स्टाय ने फला का कुछ ऐसा ही आदर्श माना है :- . 'The destiny of art in our time is to transrmit from the realm of reason to the realan of feeling the truth that well-being for men consists in their being mited together, and to set up, in place of existing reign of force, that kingdom of God that is, of love, which we all recognise to be the aim of human life.' -What is Art (World's Classics, Page 288). ' टॉल्स्टाय के मत से कला का उद्देश्य बुद्धि के.क्षेत्र से भाव के क्षेत्र में उस सत्य को ले जाना है जो कि यह बतलाता है कि मनुष्यों का कल्याण उनके एक होकर रहने में तथा ईश्वर की उस बादशाहत के स्थापित करने में है जो कि प्रेम पर आश्रित है और जिसको हम जीवन का चरम लक्ष्य मानते हैं। साहित्य शब्द में भी सहित अर्थात् हित के साथ होने का भाव है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी उसी कृति को सार्थक कहा है जो राबका हित-साधन करे :-- .. 'कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि-सम सब कहँ हित होई ॥' . ___ -रामचरितमानस (पालकाण्ड) मुन्शी प्रेमचन्द के उपन्यास प्रायः जीवन के ही लिए लिखे गये हैं। प्रगति- वाद का प्रयोजन भी प्रायः ऐसा ही है किन्तु उसमें वर्गसङ्घर्ष की भावना कुछ अधिक है। . . . ३. कला जीवन से पलायन के नर्थ । इस मत के मानने वाले लोग प्रायः ऐसे ही होते हैं जो संसार की विषमताओं और कर्कशताओं का सामना करने की शक्ति नहीं रखते अथवा जीवन के सङ्घर्ष में पराजित हो जाते हैं। धे