पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/९५

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५ : काव्य के हेतु प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्याम प्रयोजन उद्देश्य को कहते हैं अर्थात् किन-किन बातों को लक्ष्य में रखकर .. कवि अपने कार्य में युक्त होता है । प्रेरणा प्रयोजन का काव्योद्भव के हेतु प्रान्तरिक रूप है। प्रयोजन आकर्षण के रूप में होता है और प्रेरणा में आगे बढ़ाने की शक्ति रहती है। हेतु का अभिप्राय उन साधनों से है जो कि कवि को काव्यरचना में सहायक होते हैं। मम्मट ने कविता का हेतु इस प्रकार बतलाया है :- 'शक्तिनिपुणता लोककाव्यशास्त्रायवेक्षणात् । काव्यज्ञशिक्षयाऽभ्यास इति हेतुस्तदुभवे ॥' -काव्यप्रकाश (11) अर्थात् (१) शक्ति (कवित्व का बीजरूप संस्कार) जिसके बिना काव्य- रचना हो नहीं सकती और यदि होती है तो वह हास्यास्पद हो जाती है, (२) लोक, शास्त्र, काव्य आदि के निरीक्षण और ज्ञान से उत्पन्न योग्यता और (३) काव्य जानने वाले की शिक्षा द्वारा प्राप्त अभ्यास-ये काव्य के उद्भव के हेतु माने जाते हैं। काव्यप्रकाश के अनुकूल इन तीनों कारणों में शक्ति या प्रतिभा नैसर्गिकी अर्थात् जन्मसिद्ध है और शेष दो अर्जित हैं । दण्डी ने भी प्रतिभा को नैसर्गिकी कहा है :- 'नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहु निर्मलम्, अमन्दश्चाऽभियोगोऽस्या कारणं काम्यसंपदेः।' -काव्यादर्श (110) शक्ति को बहुत ही दुर्लभ माना गया है। उससे भी आगे व्युत्पत्ति (लोक और शास्त्र के ज्ञान के प्राश्रित प्रौचित्य के विचार) तथा विवेक को और भी दुर्लभ माना है :- 'कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तन च दुर्लभा।