पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/९६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१८ सिद्धान्त और अध्ययन व्युत्पत्तिदुर्लभा तन्न विवेकस्तन्न दुर्लभः ॥' ...अग्निपुराण (३३७१४) रुद्रट (नवीं शताब्दी) ने सहजा और उत्पाद्या में सहजा को मुख्यता दी है क्योंकि यह मनुष्य के साथ उत्पन्न होती है। उत्पाथा अध्ययन, अभ्यास, सत्संग से प्राप्त होती है :- 'प्रतिभेत्यपरैरुदिता सहजोत्पाद्या च सा द्विधा भवति । युसा सह जातत्वादनयोस्तु ज्यायसी सहजा ॥' । _~~-काव्यालाकार (१११६) दण्डी ने भी परिश्रम का महत्त्व स्वीकार किया है। वे कहते है कि यदि किसी व्यक्ति में कवित्व-शक्ति क्षीण भी हो तो अभ्यास करने पर विदग्ध लोगों की गोष्ठी में विहार करने योग्य हो जाता है :---- 'कृशे कवित्वेपि जनाः कृतश्नमा विदग्धगोष्ठीषु विहतु मोशते । ___ -काव्यादर्श (१५१०५) प्रायः लोग प्रतिभा को सहज ही मानते हैं (Poets are born and not made) किन्तु कुछ लोग प्रतिभा को दस में नौ प्रतिभा का महत्व हिस्से स्वेदजनक परिश्रम कहते हैं (Inspiration is . और रूप nine tenths perspiration)। गागट ने यद्यपि शक्ति को बीज माना ई. तथापि तीनों अर्थात् शक्ति, निपुणता और अभ्यास को समान-सा ही महत्त्व दिया है, इसीलिए उन्होंने तीनों को मिलाकर एक वचन हेतुः (कारण) कहा है ----'पेतुर्मतुहेतवः' । अन्य प्राचार्य (जैसे वाग्भट-१२ वीं पाताब्दी) प्रतिभा को कारण मागते हैं और व्युत्पत्ति (निपुणता) को उसका भूषण बतलाते हैं :..... 'प्रतिभा कारणं तस्य व्युत्पत्तिस्तु विभूषणम् । मुशोत्पत्तिकदभ्यास इत्यायकविसङ्कथा ॥' ___-वाग्भटातभार (१३) ___ अर्थात् प्रतिभा उसका कारण है और व्युत्पत्ति (लोक और शास्त्र के शान से उत्पन्न हुप्रा संस्कार-विशेष) उसका भूषण है और बार-बार का अभ्यास शीघ्र काव्यरचनाशयित का उत्पादक होता है, ऐसा प्राचीन कवि कहते हैं। इस प्रकार शक्ति और प्रतिभा एक ही वृत्ति के दो नाम है। . रसगंगाधरकार पण्डितराज जगन्नाथ (१७ वीं शताब्दी) ने प्रतिभा को ही कारण माना है :- 'तस्य च कारणं कविगता केवला प्रतिभा। ___सा च काव्यघटनानुकूलशब्दार्थोपस्थितिः ।.. -रसगंगाधर (काव्यमाला, पृष्ठ ८)