पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/९७

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काव्य के हेतु-प्रतिभा का महत्व और रूप उन्होंने प्रतिभा को दो भेदों में विभक्त कर दिया है, पहली प्रारब्धवश जो किसी देवता या महापुरुष के प्रसादस्वरूप प्राप्त होती है और दूसरी व्युत्पत्ति तथा काव्य-निर्माणजन्याऽभ्यास से प्राप्त । इस प्रकार वे भी वहुत-कुछ मम्मट के निकट प्राजाते हैं। इस प्रकार ये दोनों चीजें प्रतिभा का पोषण करती हैं । हेमचन्द्र (१२ वीं शताब्दी) का भी ऐसा ही मत है, उन्होंने व्युत्पत्ति और अभ्यास को प्रतिभा के संस्कारक अर्थात् चमका देने वाला माना है किन्तु वामन ने तीनों को कारण बताया है अर्थात् काव्यप्रकाशकार की भाँति तीनों मिलकर ही नहीं वरन् अलग- अलग भी कारण हो सकते हैं। प्रतिभा न भी हो तो व्युत्पत्ति और अभ्यास दोनों ही या अकेले-अकेले काव्य के हेतु हो सकते हैं। ___ प्रतिभा के सम्बन्ध में दो प्रकार के विवेचन आते हैं, एक में तो सूझ और नवीनता पर बल दिया गया है तथा दूसरे में अभिव्यक्ति को अधिक महत्त्व मिला है । काव्यकौस्तुभ में दी हुई विद्याभूषण की परिभाषा ('प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता') पहले प्रकार की है। रसगंगाधर में दी हई पण्डितराज जगन्नाथ की परिभाषा दूसरे प्रकार की है। उनका कहना है कि जिस शक्ति के द्वारा काव्य के अनुकूल शब्द और अर्थ कवि के मन में जल्दी-जल्दी आते हैं ('काव्यघटनानुकूलशब्दार्थोपस्थिति:') उसे प्रतिभा कहते हैं। वाग्भट ने दोनों बातों का समन्वय कर दिया है । कहने का तात्पर्य यह है कि उन्होंने नवीनता और उसकी ललित पदों (प्रसन्न पदों) में अभि- व्यक्ति दोनों पर जोर दिया है। उसको सर्वतोमुखी कहा है। उसका प्रसार विचार, भाव और अभिव्यक्ति सबमें है। संस्कृत का प्रसन्न पद और अंग्रेजी का 'Happy Expression' दोनों वाक्यांश एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। प्रसन्न में प्रसादगुण का भाव भी लगा हुआ है :- 'प्रसन्नपदनव्यार्थयुक्त्युबोधविधायिनी । स्फुरन्ती सत्कवेबुदिः प्रतिभा सर्वतोमुखी॥' -वाग्भटालङ्कार (११४) अर्थात् सत्कवि की प्रसन्न पदों ( ललित-प्रसादगुणयुक्त पदों ) में अभि- व्यक्त की हुई नव्यार्थ से ( अर्थात् जिनकी पूर्व में उद्भावना न की गई हो, इसी को अंग्रेजी में 'Originality' और हिन्दी में मौलिकता कहते हैं ) पूर्ण युक्तियों का उद्वोधन करने वाली, सब पोर फैलने वाली चमत्कारयुक्त बुद्धि को प्रतिभा कहते हैं। प्रतिभा के विषय में मौलिकता और साहित्यिक चोरी का प्रश्न तथा दोनों